ईश्वर की प्राप्ति और मोक्ष का मार्ग | ज्ञान, भक्ति और कर्म से आध्यात्मिक विकास
ईश्वर की प्राप्ति और मोक्ष का मार्ग
ईश्वर को प्राप्त करने या जानने के पूर्व हमें सबसे पहले परमात्मा और आत्मा की भिन्नता को समझना होगा। शास्त्रों में कहा गया है कि ईश्वर अविनाशी है और आत्मा भी अविनाशी है। इसका मतलब यह है कि हमारा जन्म ही ईश्वर की प्राप्ति के लिए हुआ है।
शरीर को चलाने के लिए हमें कर्म तो करना ही होगा, लेकिन हमारा असली उद्देश्य परमात्मा की प्राप्ति होना चाहिए। यही उद्देश्य प्राप्त करने के लिए हमें मानव का शरीर मिला है। 8,400,000 योनियों में जाने के बाद मानव जन्म मिलता है। मानव शरीर ही मोक्ष का द्वार है।
मोक्ष वह अवस्था है जिसमें आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है। शास्त्रों में मोक्ष प्राप्त करने के लिए कर्म, ज्ञान और भक्ति को विशेष रूप से महत्व दिया गया है।
जैसे नींद में हम दिन भर की बातें भूल जाते हैं और सुबह उन्हें याद करते हैं, मृत्यु में भी यह सब याद नहीं रहता। लेकिन योगी के साथ ऐसा नहीं होता। उनकी मृत्यु के बाद उन्हें पूर्व जन्म की सारी जानकारी याद रहती है। इस कारण उन्हें अमर कहा जाता है। उनके शरीर की मृत्यु होती है, लेकिन उनका आत्मिक बोध और ज्ञान अमर रहता है।
ज्ञान का अर्थ है वस्तुओं का बोध। जब ज्ञान प्राप्त होता है, सभी संदेह समाप्त हो जाते हैं। जैसे आग लकड़ी को भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञान सभी भ्रमों को जलाकर सत्य की अनुभूति कराता है।
- बुद्ध को ज्ञान (बोध) हुआ और वह पूजनीय बने।
- सांख्य योग के ज्ञान से उद्धव ने परमात्मा को जाना।
- प्रेम योग के माध्यम से गोपियों ने कृष्ण को पहचाना।
ज्ञान प्राप्त होने के बाद आत्मा परमात्मा के साथ मिलन के लिए व्याकुल होती है। यही व्याकुलता भक्ति में बदलती है। नवधा भक्ति करने वाला व्यक्ति अपने चित्त को परमात्मा से जोड़कर परमात्मा में विलीन हो जाता है।
हम सभी को गृहस्थाश्रम में शिव की शिक्षा को अमल में लाना चाहिए। किसी जंगल या पहाड़ की चोटी पर रहना सरल है, लेकिन रोजमर्रा के जीवन में सभी तकलीफों और झंझटों का सामना करते हुए भी सत्य और समता का पालन करना सच्चा शिवभक्ति है।
ओम नमः शिवाय
हर हर महादेव
हर हर महादेव
गीता में कर्म को प्रधानता दी गई है, लेकिन परमात्मा की प्राप्ति के लिए कर्म, ज्ञान और भक्ति से मार्गदर्शन दिया गया है। सभी संदेह और भ्रांतियाँ ज्ञान द्वारा भस्म हो जाती हैं। इसी कारण से ज्ञान और भक्ति का अत्यधिक महत्व है।
भक्ति का अर्थ है परमात्मा के प्रति अपार प्रेम और श्रद्धा। जब आत्मा परमात्मा के प्रति व्याकुल हो जाती है, वह भक्ति में बदलती है। नवधा भक्ति करने वाला व्यक्ति अपने चित्त को परमात्मा से जोड़कर परमात्मा में विलीन हो जाता है। यही शुद्ध भक्ति का लक्षण है।
विस्तृत डिस्क्लेमर
यह ब्लॉग केवल ज्ञान और जागरूकता के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। इसमें वर्णित घटनाएँ धार्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से आधारित हैं। पाठक से निवेदन है कि इसे केवल धार्मिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा हेतु पढ़ें। सभी पात्र एवं घटनाएँ पौराणिक हैं और वास्तविकता से अलग हो सकती हैं। इस ब्लॉग में किसी भी प्रकार की निंदात्मक या अपमानजनक सामग्री नहीं है। सभी पाठक इसे श्रद्धा एवं सम्मान के साथ ग्रहण करें। लेखक: अजय कुमार /*

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