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क्या जीवन को शांति और प्रेम के साथ भी जिया जा सकता है?

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          ऐसे भी जिया जा सकता है “जब भीतर शांति जागती है, तो जीवन को प्रेम, करुणा और मानवता के साथ ऐसे भी जिया जा सकता है।” ऐसे भी जिया जा सकता है — क्या मनुष्य अपने भीतर से दुनिया को बदल सकता है? कभी-कभी हम दुनिया को देखते हैं और सोचते हैं— लोग इतने परेशान क्यों हैं? इतनी ईर्ष्या क्यों है? इतना लोभ क्यों है? इतना संघर्ष क्यों है? मनुष्य मनुष्य से इतना दूर क्यों होता जा रहा है? फिर हम सोचते हैं कि दुनिया को बदलने के लिए बहुत कुछ करना पड़ेगा। बड़ी व्यवस्थाएँ बदलनी होंगी। बड़े निर्णय लेने होंगे। लेकिन शायद एक और रास्ता है। शायद शुरुआत बहुत छोटी हो सकती है। शायद शुरुआत मेरे और आपके बीच से हो सकती है। शायद जीवन को थोड़ा अलग ढंग से जिया जा सकता है। ऐसे भी जिया जा सकता है। सुबह की शुरुआत थोड़ी अलग हो सकती है सुबह आँख खुलते ही हमारा हाथ अक्सर मोबाइल की ओर बढ़ता है। समाचार, संदेश, काम, बाजार, दुनिया की भागदौड़—सब कुछ हमारे सामने आ जाता है। लेकिन कभी एक सुबह ऐसी भी हो सकती है जब हम कुछ क्षण चुप रहें। आँखें बंद करें। एक गहरी साँस लें। और मन ही मन कहे...

कर्ण को दुःख क्यों मिला

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 कर्ण का प्रश्न और श्रीकृष्ण का धर्म एवं विवेक का संदेश कर्ण की निष्ठा और श्रीकृष्ण के धर्म-संदेश के बीच जीवन के सही चुनाव का गहरा प्रश्न। कर्ण ने पूछा—“मैंने सत्य के लिए संघर्ष किया, फिर मुझे दुखक्यों मिला?” श्रीकृष्ण का गहरा संदेश। कर्ण के जीवन की पीड़ा, दुर्योधन के प्रति उसकी निष्ठा और श्रीकृष्ण द्वारा दिखाए गए धर्म के मार्ग से समझिए कि जीवन में केवल अच्छे गुण ही नहीं, बल्कि सही चुनाव भी क्यों आवश्यक है। कर्ण ने पूछा—“मैंने सत्य के लिए संघर्ष किया, फिर मुझे दुख क्यों मिला?” ॐ नमः शिवाय। महाभारत केवल एक युद्ध की कथा नहीं है। यह मनुष्य के भीतर चलने वाले संघर्ष की भी कथा है। इसमें ऐसे पात्र हैं, जिनमें महान गुण भी हैं और गंभीर कमजोरियाँ भी। कर्ण उन्हीं पात्रों में से एक है। कर्ण का जीवन जितना संघर्षपूर्ण था, उतना ही विचार करने योग्य भी। वह महान योद्धा था। वह दानवीर था। वह अपने मित्र के प्रति अत्यंत निष्ठावान था। उसने जीवन में अपमान सहा, संघर्ष किया और बार-बार स्वयं को सिद्ध किया। फिर भी उसके जीवन का अंत अत्यंत दुखद परिस्थितियों में हुआ। यहीं से एक प्रश्न उठता है— यदि क...

भगवान शिव के स्मरण का सही समय क्या है? जानिए शिव-स्मरण की सरल साधना

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 भगवान शिव के स्मरण का सही समय और ब्रह्म मुहूर्त में शिव ध्यान भगवान शिव का स्मरण किसी एक निश्चित समय तक सीमित नहीं है। ब्रह्म मुहूर्त, प्रातःकाल, संध्या और रात्रि—हर समय शिव-स्मरण किया जा सकता है। जानिए शिव-स्मरण का सबसे सुंदर और सरल मार्ग। भगवान शिव के स्मरण का सही समय क्या है? ॐ नमः शिवाय। भगवान शिव का स्मरण करने के लिए क्या कोई निश्चित समय होता है? क्या शिवजी का ध्यान केवल प्रातःकाल या ब्रह्म मुहूर्त में ही करना चाहिए? या फिर दिन के किसी भी समय महादेव का स्मरण किया जा सकता है? यह प्रश्न जितना सरल दिखाई देता है, उतना ही गहरा है। भगवान शिव का स्मरण केवल पूजा की एक क्रिया नहीं है। यह मन को संसार की चंचलता से हटाकर भीतर की शांति और चेतना की ओर ले जाने का माध्यम है। इसलिए शिव-स्मरण का सबसे महत्वपूर्ण समय वह है, जब मन श्रद्धा और एकाग्रता के साथ महादेव की ओर मुड़ सके। फिर भी कुछ समय ऐसे हैं, जिन्हें साधना और शिव-स्मरण के लिए विशेष रूप से अनुकूल माना गया है। 1. ब्रह्म मुहूर्त — शिव-स्मरण का श्रेष्ठ समय रात्रि के अंतिम प्रहर और सूर्योदय से पहले का समय ब्रह्म मुहूर्त कहलाता है। इ...

मनुष्य में दिव्य चेतना कैसे जागती है? | तप, ज्ञान और योग से चेतना के रूपांतरण का रहस्य

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  मनुष्य में दिव्य चेतना का जागरण तप, ज्ञान, योग और भक्ति के माध्यम से भीतर की चेतना के जागरण का प्रतीक। मनुष्य में दिव्य चेतना कैसे जागती है? | तप, ज्ञान और योग से चेतना के रूपांतरण का रहस्य क्या मनुष्य केवल शरीर और मस्तिष्क है? मनुष्य अपने जीवन को सामान्यतः शरीर और मस्तिष्क के स्तर पर समझता है। हम कहते हैं— मैं देखता हूँ। मैं सुनता हूँ। मैं सोचता हूँ। मैं निर्णय लेता हूँ। मैं सुखी हूँ। मैं दुखी हूँ। लेकिन इन सभी अनुभवों के पीछे एक और गहरी सत्ता है, जिसे भारतीय दर्शन ने चेतना के रूप में देखा है। शरीर बदलता है। विचार बदलते हैं। भावनाएँ बदलती हैं। इच्छाएँ बदलती हैं। लेकिन जो इन सबके परिवर्तन को जानता है, वह कौन है? यहीं से आध्यात्मिक मंथन प्रारंभ होता है। हमारे पिछले लेख में महर्षि वेदव्यास के असाधारण व्यक्तित्व के माध्यम से यह प्रश्न उठाया गया था कि मनुष्य तप, ज्ञान और योग के द्वारा कितनी ऊँचाई तक पहुँच सकता है। लेकिन अब प्रश्न उससे भी गहरा है— वह आंतरिक परिवर्तन होता कैसे है? क्या कोई मनुष्य जन्म से ही असाधारण होता है? या साधना धीरे-धीरे उसकी चेतना को बदलती ह...

वेदव्यास जी की दिव्य शक्ति

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                 वेदव्यास जी की दिव्य शक्ति का रहस्य योग के समन्वय से मनुष्य की चेतना कितनी ऊँचाई तक पहुँच सकती है—वेदव्यास जी का जीवन इस प्रश्न पर गहन मंथन प्रस्तुत करता है। वेदव्यास जी मनुष्य थे या  दिव्य शक्ति के अधिकारी?  तप, ज्ञान और योग से मनुष्य की चेतना की अंतिम सीमा मनुष्य से महर्षि बनने की यात्रा का रहस्य जब हम महाभारत पढ़ते हैं, तो अनेक ऐसे प्रसंग सामने आते हैं जो सामान्य मानवीय क्षमता की सीमा से बहुत आगे दिखाई देते हैं। इनमें सबसे अद्भुत व्यक्तित्वों में से एक हैं महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास । एक ओर वे मनुष्य रूप में जन्म लेते हैं। दूसरी ओर वही वेदव्यास महाभारत जैसे विराट ग्रंथ के रचयिता और वेदों के विभाजन से जुड़े महर्षि के रूप में सामने आते हैं। और फिर महाभारत में ऐसे प्रसंग भी आते हैं जहाँ उनकी शक्ति सामान्य मनुष्य की शक्ति जैसी नहीं लगती। उन्होंने संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की, जिसके माध्यम से संजय हस्तिनापुर में बैठे हुए कुरुक्षेत्र के युद्ध को देख और उसका वर्णन कर सके। युद्ध समाप्त होने के बाद भी एक और ...

जब मन भी शांत हो जाए तो क्या शेष रहता है? | शिव और आत्मज्ञान का रहस्य

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जब मन भी शांत हो जाए — शिव और साक्षी चेतना मन की चंचलता शांत होने पर भीतर की साक्षी चेतना को पहचानने की आध्यात्मिक यात्रा। जब मन भी शांत हो जाए, तब भीतर क्या शेष रहता है? एक गहरा प्रश्न: इच्छा के पार मन, और मन के पार शिव का अनुभव मनुष्य अपने जीवन में शांति खोजता है। वह इच्छाओं को पूरा करता है, फिर नई इच्छाएँ जन्म लेती हैं। वह सुख खोजता है, सुख मिलता है तो उसके छिन जाने का भय पैदा होता है। वह दुख से बचना चाहता है, लेकिन दुख से बचने का प्रयास भी मन में एक नया संघर्ष पैदा कर देता है। इसीलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि इच्छाएँ कैसे समाप्त हों? इससे भी गहरा प्रश्न है— जब इच्छाएँ शांत हो जाएँ और मन भी शांत हो जाए, तब भीतर क्या शेष रहता है? क्या वहाँ केवल खालीपन होता है? क्या विचारों का समाप्त हो जाना ही शून्यता है? या उस मौन के भीतर कोई ऐसी उपस्थिति है, जो विचारों के आने से पहले भी थी और विचारों के चले जाने के बाद भी रहती है? यहीं से आध्यात्मिक मंथन वास्तव में प्रारंभ होता है। जब इच्छा शांत होती है, तब मन की गति बदलने लगती है मन की अधिकांश गति किसी न किसी इच्छा से जुड़ी होती है। ...