सच कम भी हो लेकिन अच्छा लगता है, झूठ का पुलिंदा बाँधने से
सच कम भी हो लेकिन अच्छा लगता है आज के समय में जानकारी बहुत है, लेकिन सत्य कम दिखाई देता है। लोग सुनना भी वही चाहते हैं जो उन्हें अच्छा लगे, और कहना भी वही चाहते हैं जिससे उन्हें लाभ हो। ऐसे वातावरण में सत्य कभी-कभी अकेला पड़ जाता है। लेकिन सत्य की एक विशेषता है। उसे सजाने की आवश्यकता नहीं होती। वह छोटा हो सकता है, अपूर्ण हो सकता है, हमारे ज्ञान की सीमा के कारण अधूरा भी हो सकता है, लेकिन फिर भी वह सम्मान के योग्य होता है। इसके विपरीत झूठ को हमेशा सहारे की आवश्यकता पड़ती है। एक झूठ को छिपाने के लिए दूसरा झूठ और दूसरे को छिपाने के लिए तीसरा झूठ बोलना पड़ता है। धीरे-धीरे मनुष्य सत्य से नहीं, अपनी बनाई हुई कहानी से बंध जाता है। अध्यात्म की दृष्टि से देखें तो सत्य केवल बोलने की वस्तु नहीं है, बल्कि जीने की वस्तु है। यदि किसी विषय का ज्ञान कम है, तो यह कहना कि: "मुझे नहीं मालूम।" यह भी सत्य है। यदि किसी अनुभव को पूरी तरह नहीं समझा, तो यह कहना कि: "मैं अभी खोज में हूँ।" यह भी सत्य है। लेकिन आज मनुष्य को सबसे अधिक कठिनाई इसी बात में होती है कि वह अपनी सीमाओं को स्वीकार नहीं ...