ध्यान और अध्ययन : सत्य की खोज के दो पंख
ॐ अजय स्मरामि मानव जीवन के सबसे प्राचीन प्रश्नों में से एक है—सत्य क्या है? युगों से मनुष्य इस प्रश्न का उत्तर खोजता आया है। किसी ने संसार में खोजा, किसी ने शास्त्रों में, किसी ने गुरु के चरणों में और किसी ने अपने भीतर। भारतीय ऋषि-मुनियों ने सत्य की खोज के लिए दो महत्वपूर्ण साधनों पर विशेष बल दिया—अध्ययन और ध्यान। अध्ययन हमें दिशा देता है, और ध्यान हमें उस दिशा में चलने का अवसर देता है। शास्त्रों को पढ़ना आवश्यक है, क्योंकि वे उन महापुरुषों के अनुभवों का सार हैं जिन्होंने जीवन के गहन रहस्यों पर चिंतन किया। उपनिषद, गीता, पुराण और दर्शन-ग्रंथ केवल पुस्तकें नहीं हैं; वे मानव चेतना की हजारों वर्षों की खोज का परिणाम हैं। किन्तु केवल पढ़ लेना ही पर्याप्त नहीं है। यदि कोई व्यक्ति अनेक ग्रंथ पढ़ ले, पर कभी उनके अर्थ पर विचार न करे, तो ज्ञान शब्दों तक सीमित रह सकता है। इसीलिए भारतीय परंपरा ने तीन चरण बताए हैं— श्रवण, मनन और निदिध्यासन। पहले सुनो या पढ़ो। फिर उस पर विचार करो। और अंत में उसे अपने अनुभव में परखो। यहीं ध्यान का महत्व प्रकट होता है। ध्यान केवल मन को शांत करने की विधि न...