क्या बिना गुरु के कुंडलिनी या रीढ़ की साधना करनी चाहिए
क्या बिना जीवित गुरु के रीढ़ या कुंडलिनी साधना करनी चाहिए? एक साधक के अनुभव से समझिए आजकल इंटरनेट और यूट्यूब पर ध्यान, कुंडलिनी और रीढ़ की साधना से जुड़े अनेक वीडियो देखने को मिलते हैं। कई लोग बताते हैं कि रीढ़ की हड्डी पर ध्यान करने से ऊर्जा जागृत होती है, चेतना बदल जाती है और अद्भुत अनुभव होने लगते हैं। लेकिन क्या हर व्यक्ति को ऐसी साधनाएँ करनी चाहिए? क्या बिना जीवित गुरु के इन अभ्यासों में उतरना उचित है? यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है। रीढ़ की साधना क्या होती है? योग और तंत्र परंपराओं में रीढ़ को केवल शरीर का सहारा नहीं माना गया, बल्कि उसे सूक्ष्म ऊर्जा मार्ग से भी जोड़ा गया है। कहा जाता है कि रीढ़ के मध्य “सुषुम्ना नाड़ी” स्थित होती है और ध्यान के माध्यम से साधक अपनी चेतना को भीतर की ओर ले जाने का प्रयास करता है। इसी आधार पर: कुंडलिनी साधना, चक्र ध्यान, और कई गहरे योग अभ्यास विकसित हुए। हालाँकि आधुनिक विज्ञान इन अवधारणाओं को उसी रूप में प्रमाणित नहीं करता, लेकिन हजारों वर्षों से अनेक साधक इन मार्गों का अभ्यास करते आए हैं। लेकिन हर साधना हर व्यक्ति के लिए नहीं होती आज सबसे बड़ी समस्या...