आंतरिक शुचिता ही वास्तविक पवित्रता है | लिंग पुराण का दिव्य संदेश
"जल शरीर को शुद्ध करता है, पर शिवज्ञान अंतःकरण को प्रकाशित करता है।" आंतरिक शुचिता ही वास्तविक पवित्रता है | लिंग पुराण का दिव्य रहस्य भूमिका लिंग पुराण का आठवाँ अध्याय योग, साधना और आत्मशुद्धि का अद्भुत मार्गदर्शन करता है। सामान्यतः मनुष्य स्नान, स्वच्छ वस्त्र और बाहरी पवित्रता को ही धर्म समझ लेता है, किन्तु भगवान शिव इस अध्याय में बताते हैं कि वास्तविक पवित्रता शरीर की नहीं, बल्कि मन और अंतःकरण की होती है। जब तक मन काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से भरा रहेगा, तब तक केवल बाहरी शुद्धि साधक को परम लक्ष्य तक नहीं पहुँचा सकती। इसी कारण लिंग पुराण बाह्य शुचिता से अधिक आंतरिक शुचिता पर बल देता है। शुचिता के दो स्वरूप लिंग पुराण में शुचिता के दो प्रकार बताए गए हैं— बाह्य शुचिता आंतरिक शुचिता बाह्य शुचिता में जल स्नान, भस्म स्नान, मंत्र स्नान तथा शरीर की स्वच्छता सम्मिलित है। ये सभी धार्मिक जीवन के आवश्यक अंग हैं और साधक को अनुशासन की ओर ले जाते हैं। किन्तु भगवान शिव कहते हैं कि इन सबसे भी श्रेष्ठ आंतरिक शुचिता है। यदि मन अशुद्ध है, तो बाहरी स्नान केवल शरीर को स्वच्छ क...