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मनुष्य में दिव्य चेतना कैसे जागती है? | तप, ज्ञान और योग से चेतना के रूपांतरण का रहस्य

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  मनुष्य में दिव्य चेतना का जागरण तप, ज्ञान, योग और भक्ति के माध्यम से भीतर की चेतना के जागरण का प्रतीक। मनुष्य में दिव्य चेतना कैसे जागती है? | तप, ज्ञान और योग से चेतना के रूपांतरण का रहस्य क्या मनुष्य केवल शरीर और मस्तिष्क है? मनुष्य अपने जीवन को सामान्यतः शरीर और मस्तिष्क के स्तर पर समझता है। हम कहते हैं— मैं देखता हूँ। मैं सुनता हूँ। मैं सोचता हूँ। मैं निर्णय लेता हूँ। मैं सुखी हूँ। मैं दुखी हूँ। लेकिन इन सभी अनुभवों के पीछे एक और गहरी सत्ता है, जिसे भारतीय दर्शन ने चेतना के रूप में देखा है। शरीर बदलता है। विचार बदलते हैं। भावनाएँ बदलती हैं। इच्छाएँ बदलती हैं। लेकिन जो इन सबके परिवर्तन को जानता है, वह कौन है? यहीं से आध्यात्मिक मंथन प्रारंभ होता है। हमारे पिछले लेख में महर्षि वेदव्यास के असाधारण व्यक्तित्व के माध्यम से यह प्रश्न उठाया गया था कि मनुष्य तप, ज्ञान और योग के द्वारा कितनी ऊँचाई तक पहुँच सकता है। लेकिन अब प्रश्न उससे भी गहरा है— वह आंतरिक परिवर्तन होता कैसे है? क्या कोई मनुष्य जन्म से ही असाधारण होता है? या साधना धीरे-धीरे उसकी चेतना को बदलती ह...

वेदव्यास जी की दिव्य शक्ति

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                 वेदव्यास जी की दिव्य शक्ति का रहस्य योग के समन्वय से मनुष्य की चेतना कितनी ऊँचाई तक पहुँच सकती है—वेदव्यास जी का जीवन इस प्रश्न पर गहन मंथन प्रस्तुत करता है। वेदव्यास जी मनुष्य थे या  दिव्य शक्ति के अधिकारी?  तप, ज्ञान और योग से मनुष्य की चेतना की अंतिम सीमा मनुष्य से महर्षि बनने की यात्रा का रहस्य जब हम महाभारत पढ़ते हैं, तो अनेक ऐसे प्रसंग सामने आते हैं जो सामान्य मानवीय क्षमता की सीमा से बहुत आगे दिखाई देते हैं। इनमें सबसे अद्भुत व्यक्तित्वों में से एक हैं महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास । एक ओर वे मनुष्य रूप में जन्म लेते हैं। दूसरी ओर वही वेदव्यास महाभारत जैसे विराट ग्रंथ के रचयिता और वेदों के विभाजन से जुड़े महर्षि के रूप में सामने आते हैं। और फिर महाभारत में ऐसे प्रसंग भी आते हैं जहाँ उनकी शक्ति सामान्य मनुष्य की शक्ति जैसी नहीं लगती। उन्होंने संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की, जिसके माध्यम से संजय हस्तिनापुर में बैठे हुए कुरुक्षेत्र के युद्ध को देख और उसका वर्णन कर सके। युद्ध समाप्त होने के बाद भी एक और ...

जब मन भी शांत हो जाए तो क्या शेष रहता है? | शिव और आत्मज्ञान का रहस्य

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जब मन भी शांत हो जाए — शिव और साक्षी चेतना मन की चंचलता शांत होने पर भीतर की साक्षी चेतना को पहचानने की आध्यात्मिक यात्रा। जब मन भी शांत हो जाए, तब भीतर क्या शेष रहता है? एक गहरा प्रश्न: इच्छा के पार मन, और मन के पार शिव का अनुभव मनुष्य अपने जीवन में शांति खोजता है। वह इच्छाओं को पूरा करता है, फिर नई इच्छाएँ जन्म लेती हैं। वह सुख खोजता है, सुख मिलता है तो उसके छिन जाने का भय पैदा होता है। वह दुख से बचना चाहता है, लेकिन दुख से बचने का प्रयास भी मन में एक नया संघर्ष पैदा कर देता है। इसीलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि इच्छाएँ कैसे समाप्त हों? इससे भी गहरा प्रश्न है— जब इच्छाएँ शांत हो जाएँ और मन भी शांत हो जाए, तब भीतर क्या शेष रहता है? क्या वहाँ केवल खालीपन होता है? क्या विचारों का समाप्त हो जाना ही शून्यता है? या उस मौन के भीतर कोई ऐसी उपस्थिति है, जो विचारों के आने से पहले भी थी और विचारों के चले जाने के बाद भी रहती है? यहीं से आध्यात्मिक मंथन वास्तव में प्रारंभ होता है। जब इच्छा शांत होती है, तब मन की गति बदलने लगती है मन की अधिकांश गति किसी न किसी इच्छा से जुड़ी होती है। ...

जब कोई इच्छा शेष नहीं रहती, तब मन कहाँ जाता है? | उपनिषद, गीता और शिवदर्शन का रहस्य

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इ   जब सभी इच्छाएँ शांत हो जाती हैं, तब मन बाहर नहीं भटकता बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप की ओर लौटने लगता है। जब कोई इच्छा शेष नहीं रहती, तब मन कहाँ जाता है? भूमिका साधना के मार्ग पर एक समय ऐसा भी आता है जब साधक अपने भीतर एक अद्भुत परिवर्तन अनुभव करता है। संसार की वस्तुओं की चाह धीरे-धीरे कम होने लगती है। सम्मान मिले या न मिले, सफलता मिले या न मिले, मन पहले जैसा विचलित नहीं होता। धीरे-धीरे एक और गहरा परिवर्तन होता है। साधक को यह भी अनुभव होने लगता है कि अब परमात्मा को पाने की भी वैसी व्याकुल इच्छा नहीं रही, जैसी पहले थी। यहीं एक अत्यंत सूक्ष्म प्रश्न जन्म लेता है— "जब किसी वस्तु की इच्छा नहीं रहती, यहाँ तक कि परमात्मा की भी नहीं, तब मन कहाँ जाता है?" क्या यह साधना का अंत है? या यहीं से आत्मबोध की वास्तविक यात्रा प्रारम्भ होती है? इस प्रश्न का उत्तर वेद, उपनिषद, भगवद्गीता तथा शिवदर्शन की सहायता से समझने का प्रयास करते हैं। इच्छा का स्वभाव क्या है? सामान्यतः मन किसी न किसी वस्तु की ओर दौड़ता रहता है। कभी धन की इच्छा, कभी सम्मान की, कभी सफलता की, कभी ज्ञान की और कभी ईश्व...

शिव को पाने के बाद क्या शेष रह जाता है? | शिवभक्ति और आत्मबोध का रहस्य

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शिव की प्राप्ति और आत्मबोध जब पाने की इच्छा शांत होने लगती है, तब शिवभक्ति धीरे-धीरे समर्पण और आत्मबोध की ओर ले जाती है। शिव को पाने के बाद क्या शेष रह जाता है? मनुष्य जब आध्यात्मिक मार्ग पर चलता है, तो उसके भीतर एक इच्छा धीरे-धीरे जन्म लेती है—भगवान को प्राप्त करने की इच्छा। कोई उन्हें पूजा में खोजता है, कोई जप में, कोई ध्यान में, कोई तीर्थ में और कोई अपने हृदय की गहराइयों में। भक्त के लिए भगवान शिव केवल एक आराध्य देव नहीं होते। वे उसके विश्वास, प्रेम, आश्रय और जीवन के केंद्र बन जाते हैं। लेकिन साधना के मार्ग पर एक दिन एक अत्यन्त सूक्ष्म प्रश्न सामने आता है— "यदि शिव की प्राप्ति हो जाए, तो उसके बाद क्या शेष रह जाता है?" क्या साधना समाप्त हो जाती है? क्या ध्यान की आवश्यकता नहीं रहती? क्या संसार से सारे संबंध समाप्त हो जाते हैं? या शिव की प्राप्ति के बाद जीवन को देखने की दृष्टि ही बदल जाती है? शिव को पाना क्या है? सामान्यतः हम "प्राप्ति" शब्द का अर्थ किसी ऐसी वस्तु को हासिल करना समझते हैं जो पहले हमारे पास नहीं थी। धन प्राप्त करना, सम्मान प्राप्त करना, ज्ञ...

शिव और समय (महाकाल): क्या महाकाल समय से भी परे हैं?

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 महाकाल : समय के भी आधार भगवान शिव समय सम्पूर्ण सृष्टि को संचालित करता है, किन्तु महाकाल भगवान शिव समय के भी आधार हैं। शिव और समय (महाकाल): क्या महाकाल समय से भी परे हैं? क्या समय स्वयं भगवान शिव की सत्ता से उत्पन्न हुआ है? आइए वेद, उपनिषद, भगवद्गीता और लिंग पुराण के आलोक में इस अद्भुत रहस्य का मंथन करें। भूमिका इस संसार में यदि कोई ऐसी शक्ति है जिसके सामने राजा, ऋषि, देवता, वैज्ञानिक और सामान्य मनुष्य—सभी समान दिखाई देते हैं, तो वह है समय (काल) । समय किसी के लिए नहीं रुकता। जन्म से लेकर मृत्यु तक सम्पूर्ण जीवन उसी की धारा में प्रवाहित होता रहता है। बालक युवा बनता है, युवा वृद्ध होता है और एक दिन शरीर पंचमहाभूतों में विलीन हो जाता है। इसी कारण संसार के अधिकांश लोग समय को सबसे शक्तिशाली मानते हैं। किन्तु सनातन धर्म इससे भी आगे का सत्य प्रकट करता है। वह भगवान शिव को महाकाल कहता है। यदि काल ही सबसे शक्तिशाली है, तो फिर महाकाल कौन हैं? क्या समय भी किसी के अधीन हो सकता है? क्या समय स्वयं भी उत्पन्न हुआ है? इन प्रश्नों का उत्तर केवल दर्शन नहीं देता, बल्कि वेद, उपनिषद, भगवद्गी...

एकोऽहम् बहुस्यामि : क्या सम्पूर्ण सृष्टि ईश्वर की दिव्य लीला है? | सनातन धर्म का रहस्य

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 एकोऽहम् बहुस्यामि : सम्पूर्ण सृष्टि ईश्वर की दिव्य लीला सनातन धर्म के अनुसार सम्पूर्ण जगत उसी एक परम चेतना की अनंत अभिव्यक्ति है। क्या सम्पूर्ण सृष्टि ईश्वर की दिव्य लीला है? एकोऽहम् बहुस्यामि : एक से अनेक होने का सनातन रहस्य भूमिका जब कोई साधक शांत मन से , सूर्य बिना किसी स्वार्थ के प्रकाश देता है। पुष्प बिना किसी आग्रह के सुगंध फैलाता है। नदी बिना भेदभाव के सबको जल देती है। उसी प्रकार परमात्मा की पूर्ण सत्ता से यह सम्पूर्ण सृष्टि प्रकट होती है। यह किसी आवश्यकता का परिणाम नहीं, बल्कि दिव्य अभिव्यक्ति है। सूर्य और जल का उदाहरण एक सूर्य आकाश में स्थित है। किन्तु यदि हजारों तालाब, नदियाँ और जल से भरे पात्र हों, तो प्रत्येक में सूर्य का अलग-अलग प्रतिबिंब दिखाई देता है। क्या वास्तव में हजारों सूर्य हैं? नहीं। सूर्य एक ही है। प्रतिबिंब अनेक दिखाई देते हैं। इसी प्रकार परमात्मा एक हैं। जीव असंख्य दिखाई देते हैं। मूल चेतना एक ही है। यदि सबमें वही हैं, तो भेदभाव क्यों? यही प्रश्न मनुष्य को सबसे अधिक भ्रमित करता है। यदि सबमें ईश्वर हैं, तो फिर कोई ज्ञानी है, कोई अज्ञा...