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रहस्य सुनना आसान है, सत्य खोजना कठिन

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  रहस्य सुनना आसान है, सत्य खोजना कठिन ॐ अजय स्मरामि मनुष्य का मन सदैव रहस्यों की ओर आकर्षित होता है। जितनी अधिक किसी विषय में रहस्यमयता होती है, उतनी ही अधिक जिज्ञासा जागती है। शायद यही कारण है कि भूत, प्रेत, यक्षिणी, योगिनी, गुप्त शक्तियाँ और चमत्कारों की कथाएँ लोगों को सहज ही अपनी ओर खींच लेती हैं। आज के समय में भी अनेक लोग ऐसे विषयों को सुनना पसंद करते हैं। पुस्तकों, कथाओं, वीडियो और विभिन्न माध्यमों में इन विषयों की चर्चा बहुत मिलती है। इनमें से कुछ बातें लोक परंपराओं से आती हैं, कुछ धार्मिक मान्यताओं से और कुछ व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित होती हैं। इन सबका अपना स्थान हो सकता है, परंतु एक महत्वपूर्ण प्रश्न है— क्या आकर्षण और सत्य एक ही बात हैं? कई बार जो बात सबसे अधिक रोचक लगती है, वही सबसे अधिक सत्य हो, यह आवश्यक नहीं है। एक साधारण व्यक्ति के सामने जीवन में अनेक प्रश्न होते हैं। उसे अपने परिवार का पालन करना है, अपने चरित्र का निर्माण करना है, अपने जीवन का उद्देश्य समझना है और अपने भीतर शांति तथा संतुलन विकसित करना है। ऐसे में यदि उसका अधिकांश समय केवल रहस्यमय कथाओं, भय...

ध्यान और अध्ययन : सत्य की खोज के दो पंख

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ॐ अजय स्मरामि मानव जीवन के सबसे प्राचीन प्रश्नों में से एक है—सत्य क्या है? युगों से मनुष्य इस प्रश्न का उत्तर खोजता आया है। किसी ने संसार में खोजा, किसी ने शास्त्रों में, किसी ने गुरु के चरणों में और किसी ने अपने भीतर। भारतीय ऋषि-मुनियों ने सत्य की खोज के लिए दो महत्वपूर्ण साधनों पर विशेष बल दिया—अध्ययन और ध्यान। अध्ययन हमें दिशा देता है, और ध्यान हमें उस दिशा में चलने का अवसर देता है। शास्त्रों को पढ़ना आवश्यक है, क्योंकि वे उन महापुरुषों के अनुभवों का सार हैं जिन्होंने जीवन के गहन रहस्यों पर चिंतन किया। उपनिषद, गीता, पुराण और दर्शन-ग्रंथ केवल पुस्तकें नहीं हैं; वे मानव चेतना की हजारों वर्षों की खोज का परिणाम हैं। किन्तु केवल पढ़ लेना ही पर्याप्त नहीं है। यदि कोई व्यक्ति अनेक ग्रंथ पढ़ ले, पर कभी उनके अर्थ पर विचार न करे, तो ज्ञान शब्दों तक सीमित रह सकता है। इसीलिए भारतीय परंपरा ने तीन चरण बताए हैं— श्रवण, मनन और निदिध्यासन। पहले सुनो या पढ़ो। फिर उस पर विचार करो। और अंत में उसे अपने अनुभव में परखो। यहीं ध्यान का महत्व प्रकट होता है। ध्यान केवल मन को शांत करने की विधि न...

साधना और प्रसिद्धि : एक साधक की आंतरिक यात्रा

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 ॐ अजय स्मरामि मनुष्य के जीवन में प्रसिद्धि का आकर्षण स्वाभाविक है। हर व्यक्ति चाहता है कि लोग उसे जानें, उसका सम्मान करें और उसके कार्यों की प्रशंसा करें। संसार की दृष्टि से इसमें कोई बुराई नहीं है। समाज में अच्छे कार्य करने वाले लोगों को सम्मान मिलना भी चाहिए। परंतु जब हम आध्यात्मिकता के क्षेत्र में प्रवेश करते हैं, तब एक प्रश्न उठता है— क्या सच्चा साधक भी प्रसिद्धि चाहता है? यह प्रश्न जितना सरल दिखाई देता है, उतना है नहीं। साधना का अर्थ है स्वयं को जानने की यात्रा। इस यात्रा में साधक का ध्यान धीरे-धीरे बाहरी संसार से हटकर अपने भीतर की ओर जाने लगता है। वह यह समझने लगता है कि प्रशंसा और निंदा दोनों क्षणिक हैं। आज जो व्यक्ति सम्मान दे रहा है, वही कल आलोचना भी कर सकता है। साधक का लक्ष्य लोगों की दृष्टि में बड़ा बनना नहीं, बल्कि अपने भीतर के अज्ञान को कम करना होता है। इतिहास में अनेक ऋषि-मुनि, योगी और संत हुए। उनमें से बहुतों ने कभी प्रसिद्धि की इच्छा नहीं की। वे वन में रहे, पर्वतों में रहे, कुटियों में रहे। फिर भी लोग उन्हें खोजते हुए उनके पास पहुँचे। इसका कारण यह था कि सत्य का प्रक...

सच कम भी हो लेकिन अच्छा लगता है, झूठ का पुलिंदा बाँधने से

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सच कम भी हो लेकिन अच्छा लगता है आज के समय में जानकारी बहुत है, लेकिन सत्य कम दिखाई देता है। लोग सुनना भी वही चाहते हैं जो उन्हें अच्छा लगे, और कहना भी वही चाहते हैं जिससे उन्हें लाभ हो। ऐसे वातावरण में सत्य कभी-कभी अकेला पड़ जाता है। लेकिन सत्य की एक विशेषता है। उसे सजाने की आवश्यकता नहीं होती। वह छोटा हो सकता है, अपूर्ण हो सकता है, हमारे ज्ञान की सीमा के कारण अधूरा भी हो सकता है, लेकिन फिर भी वह सम्मान के योग्य होता है। इसके विपरीत झूठ को हमेशा सहारे की आवश्यकता पड़ती है। एक झूठ को छिपाने के लिए दूसरा झूठ और दूसरे को छिपाने के लिए तीसरा झूठ बोलना पड़ता है। धीरे-धीरे मनुष्य सत्य से नहीं, अपनी बनाई हुई कहानी से बंध जाता है। अध्यात्म की दृष्टि से देखें तो सत्य केवल बोलने की वस्तु नहीं है, बल्कि जीने की वस्तु है। यदि किसी विषय का ज्ञान कम है, तो यह कहना कि: "मुझे नहीं मालूम।" यह भी सत्य है। यदि किसी अनुभव को पूरी तरह नहीं समझा, तो यह कहना कि: "मैं अभी खोज में हूँ।" यह भी सत्य है। लेकिन आज मनुष्य को सबसे अधिक कठिनाई इसी बात में होती है कि वह अपनी सीमाओं को स्वीकार नहीं ...

वसुधैव कुटुम्बकम् : युद्ध नहीं, विश्व कल्याण की ओर

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  मनुष्य ने विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अद्भुत प्रगति की है। आज हम अंतरिक्ष तक पहुँच चुके हैं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का निर्माण कर चुके हैं और संसार को एक वैश्विक परिवार के रूप में जोड़ने की क्षमता रखते हैं। परंतु एक प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है—क्या हमारी नैतिक चेतना भी उतनी ही विकसित हुई है जितनी हमारी तकनीक? भारतीय दर्शन में एक गूढ़ वाक्य आता है—"एकोऽहम् बहुस्यामि" अर्थात् "मैं एक हूँ, अनेक हो जाऊँ।" सृष्टि की रचना का यही मूल भाव है। परमात्मा ने इस विराट जगत की रचना केवल भौतिक अस्तित्व के लिए नहीं, बल्कि प्रेम, सहयोग, करुणा और सह-अस्तित्व के लिए की। प्रकृति की ओर दृष्टि डालिए। पर्वत, नदियाँ, वन, पशु-पक्षी और समस्त जीव-जगत एक अद्भुत संतुलन में कार्य करते हैं। परंतु मनुष्य ने अपने अहंकार और स्वार्थ के कारण इस संतुलन को चुनौती दी। परिणाम हमारे सामने हैं—ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण, जल संकट, अत्यधिक तापमान, जंगलों का विनाश और प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती घटनाएँ। जब मनुष्य प्रकृति से दूर होता है, तब वह स्वयं से भी दूर हो जाता है। शांति केवल युद्ध का अभाव नहीं है। शांत...

परमात्मा कहाँ है? एक साधक की दृष्टि

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  नागमती का विरह, मंदिरों की शांति और मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य आज का मनुष्य विज्ञान, तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में जी रहा है। वह अंतरिक्ष की खोज कर रहा है, सुपर कंप्यूटर बना रहा है और प्रकृति के अनेक रहस्यों को समझने का प्रयास कर रहा है। यह प्रगति स्वागत योग्य है, परंतु एक प्रश्न आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना हजारों वर्ष पहले था— मैं कौन हूँ और इस जीवन का उद्देश्य क्या है? हमारे ऋषि-मुनियों ने जिन सत्यों का अनुभव किया, उन्हें उन्होंने सीधे शब्दों में नहीं, बल्कि प्रतीकों, कथाओं और शास्त्रों के माध्यम से व्यक्त किया। नागमती का विरह भी ऐसा ही एक प्रतीक है। यह केवल एक स्त्री का अपने प्रिय से बिछोह नहीं, बल्कि आत्मा की परमात्मा के प्रति तड़प का संकेत है। जो साधक इस विरह को समझता है, वह जानता है कि मनुष्य के भीतर एक ऐसी खोज चलती रहती है जिसे केवल भौतिक उपलब्धियाँ शांत नहीं कर सकतीं। यही कारण है कि अध्यात्म की परंपरा आज भी जीवित है। दुर्भाग्य से आज अनेक लोग बिना जाने, बिना पढ़े और बिना अनुभव किए ही परमात्मा के अस्तित्व को नकार देते हैं। किसी भी विषय को समझने से पहले...

शिव खेले मसाने में होली : जीवन, मृत्यु और मोक्ष का शाश्वत सत्य

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  शिव  खेले  मसाने  में होली :  एक  सामाजिक  और  आध्यात्मिक  अवधारणा शिव खेले मसाने में होली।  लेकर भूतों-प्रेतों की टोली।। भगवान शिव का व्यक्तित्व अद्भुत है। वे केवल देवों के देव महादेव ही नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु दोनों के साक्षी हैं। वे श्मशान में भी विराजते हैं और कैलाश पर भी। वे भूतों, प्रेतों, पशुओं, मनुष्यों और समस्त सृष्टि के स्वामी हैं। यही कारण है कि शिव को "भूतभावन" कहा गया है। मनुष्य अपने जीवन में सामाजिक संबंधों, धन, प्रतिष्ठा और भौतिक सुखों में इतना व्यस्त हो जाता है कि वह अपने अस्तित्व के मूल सत्य को भूल जाता है। वह स्वयं को परिवार, समाज और संपत्ति तक सीमित समझने लगता है, जबकि संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार शिवतत्त्व है। मनुष्य और सामाजिक संरचना मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा जाता है। वह जन्म से लेकर मृत्यु तक अनेक संबंधों का निर्वहन करता है—पिता, पुत्र, भाई, पति, मित्र और नागरिक के रूप में। परंतु अक्सर वह इन संबंधों को ही अंतिम सत्य मान बैठता है। वास्तविकता यह है कि अधिकांश संबंध परिस्थितियों और स्वार्थों पर आधारित होते ह...