लिंग पुराण के अनुसार योग क्या है? भगवान शिव द्वारा बताया गया वास्तविक अर्थ
लिंग पुराण के अनुसार योग का उद्देश्य केवल शरीर को साधना नहीं, बल्कि जीव को परमार्थ तत्त्व के ज्ञान तक पहुँचाना है। लिंग पुराण के अनुसार योग क्या है? भगवान शिव द्वारा बताया गया वास्तविक अर्थ आज के समय में जब योग का नाम लिया जाता है, तो अधिकांश लोगों के मन में आसन, व्यायाम और शारीरिक स्वास्थ्य का विचार आता है। निस्संदेह ये योग के महत्वपूर्ण अंग हैं, लेकिन लिंग पुराण योग का एक कहीं अधिक गहरा और व्यापक अर्थ प्रस्तुत करता है। लिंग पुराण के आठवें अध्याय में भगवान शिव द्वारा वर्णित योग का स्वरूप केवल शरीर तक सीमित नहीं है। वहाँ योग का उद्देश्य मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप का ज्ञान कराना बताया गया है। ग्रंथ में कहा गया है— "जीव को परमार्थ तत्व का ज्ञान प्राप्त होना ही योग है।" यह परिभाषा अत्यंत गहन है। इसका अर्थ है कि योग केवल शरीर को स्वस्थ बनाने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीव को परम सत्य के ज्ञान तक पहुँचाने का मार्ग है। भगवान शिव बताते हैं कि योग के लिए शरीर में कुछ विशेष स्थान महत्वपूर्ण माने गए हैं। गले और नाभि के मध्य स्थित हृदयकमल, नाभि के नीचे मूलाधार तथा दोनों भृकुट...