गुरु और शिष्य — जब शिष्य गुरु को स्वयं का स्मरण कराए
जब शिष्य गुरु को स्वयं का स्मरण कराए” सच्ची साधना केवल स्वयं को स्थिर करना नहीं, बल्कि संसार के मध्य स्वयं को विस्मृत होने से बचाना है। गुरु और शिष्य — जब शिष्य गुरु को स्वयं का स्मरण कराए मनुष्य जब साधना के मार्ग पर चलता है, तब वह अक्सर सोचता है कि गुरु उसे केवल ऊपर उठने का मार्ग दिखाएगा। गुरु उसे ध्यान, एकाग्रता, संयम और आत्मनिरीक्षण सिखाएगा। लेकिन साधना की यात्रा में एक ऐसा क्षण भी आ सकता है, जब शिष्य को गुरु का हाथ पकड़ना पड़े। यह बात सुनने में असामान्य लग सकती है, पर इसके भीतर गुरु–शिष्य संबंध का एक अत्यंत गहरा अर्थ छिपा है। गुरु ने कभी शिष्य का हाथ पकड़कर उसे कठिन साधना में स्थिर होना सिखाया था। उसे समझाया था कि मन को परिस्थितियों के अनुसार नहीं, अपने भीतर के केंद्र में स्थिर करना है। पर संसार से दूर रहकर स्थिर होना एक बात है और स्नेह, संबंध, सम्मान, वैभव तथा आकर्षण के बीच स्वयं को पहचानते रहना दूसरी बात। यहीं साधना की वास्तविक परीक्षा आरंभ होती है। प्रश्न — क्या तप केवल एकांत में होता है? नहीं। एकांत में मन को शांत करना कठिन हो सकता है, लेकिन ...