जब मन भी शांत हो जाए तो क्या शेष रहता है? | शिव और आत्मज्ञान का रहस्य
जब मन भी शांत हो जाए — शिव और साक्षी चेतना मन की चंचलता शांत होने पर भीतर की साक्षी चेतना को पहचानने की आध्यात्मिक यात्रा। जब मन भी शांत हो जाए, तब भीतर क्या शेष रहता है? एक गहरा प्रश्न: इच्छा के पार मन, और मन के पार शिव का अनुभव मनुष्य अपने जीवन में शांति खोजता है। वह इच्छाओं को पूरा करता है, फिर नई इच्छाएँ जन्म लेती हैं। वह सुख खोजता है, सुख मिलता है तो उसके छिन जाने का भय पैदा होता है। वह दुख से बचना चाहता है, लेकिन दुख से बचने का प्रयास भी मन में एक नया संघर्ष पैदा कर देता है। इसीलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि इच्छाएँ कैसे समाप्त हों? इससे भी गहरा प्रश्न है— जब इच्छाएँ शांत हो जाएँ और मन भी शांत हो जाए, तब भीतर क्या शेष रहता है? क्या वहाँ केवल खालीपन होता है? क्या विचारों का समाप्त हो जाना ही शून्यता है? या उस मौन के भीतर कोई ऐसी उपस्थिति है, जो विचारों के आने से पहले भी थी और विचारों के चले जाने के बाद भी रहती है? यहीं से आध्यात्मिक मंथन वास्तव में प्रारंभ होता है। जब इच्छा शांत होती है, तब मन की गति बदलने लगती है मन की अधिकांश गति किसी न किसी इच्छा से जुड़ी होती है। ...