क्या जीवन को शांति और प्रेम के साथ भी जिया जा सकता है?
ऐसे भी जिया जा सकता है “जब भीतर शांति जागती है, तो जीवन को प्रेम, करुणा और मानवता के साथ ऐसे भी जिया जा सकता है।” ऐसे भी जिया जा सकता है — क्या मनुष्य अपने भीतर से दुनिया को बदल सकता है? कभी-कभी हम दुनिया को देखते हैं और सोचते हैं— लोग इतने परेशान क्यों हैं? इतनी ईर्ष्या क्यों है? इतना लोभ क्यों है? इतना संघर्ष क्यों है? मनुष्य मनुष्य से इतना दूर क्यों होता जा रहा है? फिर हम सोचते हैं कि दुनिया को बदलने के लिए बहुत कुछ करना पड़ेगा। बड़ी व्यवस्थाएँ बदलनी होंगी। बड़े निर्णय लेने होंगे। लेकिन शायद एक और रास्ता है। शायद शुरुआत बहुत छोटी हो सकती है। शायद शुरुआत मेरे और आपके बीच से हो सकती है। शायद जीवन को थोड़ा अलग ढंग से जिया जा सकता है। ऐसे भी जिया जा सकता है। सुबह की शुरुआत थोड़ी अलग हो सकती है सुबह आँख खुलते ही हमारा हाथ अक्सर मोबाइल की ओर बढ़ता है। समाचार, संदेश, काम, बाजार, दुनिया की भागदौड़—सब कुछ हमारे सामने आ जाता है। लेकिन कभी एक सुबह ऐसी भी हो सकती है जब हम कुछ क्षण चुप रहें। आँखें बंद करें। एक गहरी साँस लें। और मन ही मन कहे...