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योग-साधना से प्राप्त होने वाली सिद्धियाँ — लिंग पुराण में वर्णित अद्भुत योगिक अनुभूतियाँ

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       योग-साधना से प्राप्त सिद्धियाँ — लिंग पुराण लिंग पुराण में वर्णित योग-सिद्धियों और शिव-तत्त्व की अनुभूति का ध्यान करते हुए योगी योग-साधना से प्राप्त होने वाली सिद्धियाँ — लिंग पुराण में वर्णित अद्भुत योगिक अनुभूतियाँ योग केवल शरीर और मन को शांत करने की साधना नहीं है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में योग को चेतना के क्रमिक विस्तार का मार्ग भी माना गया है। जब साधक का चित्त अत्यंत सूक्ष्म और एकाग्र होता है, तब उसके भीतर ऐसी विशेष अनुभूतियों का वर्णन मिलता है जिन्हें सामान्य इंद्रियों की सीमाओं से परे माना गया है। लिंग पुराण  में योग से संबंधित ऐसे ही अनेक विशेष ज्ञान और सिद्धियों का वर्णन मिलता है। इनका उल्लेख यह बताने के लिए किया गया है कि योग-साधना के परिणामस्वरूप साधक की चेतना किस प्रकार सूक्ष्म विषयों को ग्रहण करने में सक्षम मानी गई है। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि ये वर्णन आध्यात्मिक ग्रंथ की परंपरा का हिस्सा हैं। इन्हें आधुनिक वैज्ञानिक दावे के रूप में नहीं, बल्कि योग-दर्शन में वर्णित सिद्धियों और चेतना की अवस्थाओं के रूप में समझना चाहिए। सूक्ष्म और छिपी...

हृदय-कमल में शिव का ध्यान — लिंग पुराण में वर्णित योग-साधना

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हृदय-कमल में शिव का ध्यान — लिंग पुराण की योग-साधना हृदय-कमल में शिव का ध्यान — लिंग पुराण में वर्णित योग-साधना मनुष्य जब बाहरी संसार से अपनी दृष्टि हटाकर अपने भीतर की ओर यात्रा प्रारंभ करता है, तब योग केवल शरीर को साधने की प्रक्रिया नहीं रह जाता। वह धीरे-धीरे मन, गुणों और अंततः स्वयं की वास्तविक सत्ता को जानने का मार्ग बन जाता है। लिंग पुराण के आठवें अध्याय में योगी के लिए आसन, इंद्रिय-संयम, ध्यान और शिव-तत्त्व के चिंतन की एक गहन साधना का वर्णन मिलता है। साधक को क्रमशः चित्त को एकाग्र करते हुए हृदय-कमल में परम शिव का ध्यान करने की दिशा दिखाई गई है। दृढ़ आसन और अंतर्मुखी दृष्टि बुद्धिमान योगी को इस प्रकार दोनों जानू बराबर करके अथवा एक जानू में स्थित होकर वृषण तथा लिंग को दोनों एड़ियों के बीच करके दृढ़ आसन लगाकर, मुख को बंद करके, सिर को कुछ ऊँचा उठाकर दाँतों का परस्पर स्पर्श बनाए रखना चाहिए। सभी ओर से दृष्टि को रोककर उन्मीलित नेत्रों से अपने नासिकाग्र पर दृष्टि केंद्रित करनी चाहिए तथा वक्षस्थल को आगे की ओर उन्नत रखना चाहिए। योगी को तमोगुण को रजोगुण से तथा रजोगुण को सत्त्वगुण से आच...

मनुष्य को जीवन में दुख क्यों मिलता है? — शिव-दृष्टि से समझिए

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 “दुख क्यों मिलता है?” “शिव-दृष्टि हमें दुख से भागना नहीं, उसके भीतर छिपे सत्य को देखने की दृष्टि देती है।” “यदि मनुष्य अच्छे कर्म करता है, किसी का बुरा नहीं चाहता और फिर भी उसके जीवन में दुख आता है, तो आखिर ऐसा क्यों होता है?” अच्छे कर्म करने पर भी दुख क्यों मिलता है? यह प्रश्न केवल किसी एक व्यक्ति का प्रश्न नहीं है। जीवन में कभी न कभी लगभग हर मनुष्य इस प्रश्न के सामने खड़ा होता है। कभी किसी अपने का साथ छूट जाता है। कभी मेहनत के बाद भी सफलता नहीं मिलती। कभी बिना किसी स्पष्ट कारण के मन अशांत रहता है। और कभी ऐसा लगता है कि हमने किसी का बुरा नहीं किया, फिर हमारे साथ ही ऐसा क्यों हुआ? तब मन पूछता है— “मैंने ऐसा क्या किया था?” यहीं से मनुष्य की आध्यात्मिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण द्वार खुल सकता है। क्योंकि शायद जीवन का उद्देश्य केवल सुख प्राप्त करना नहीं है। शायद कुछ अनुभव हमें अपने भीतर देखने, अपनी इच्छाओं और आसक्तियों को समझने और अंततः अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने की दिशा में ले जाते हैं। शिव-दृष्टि हमें दुख से भागना नहीं सिखाती। वह हमें दुख के भीतर छिपे सत्य को देखने क...

क्या जीवन को शांति और प्रेम के साथ भी जिया जा सकता है?

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          ऐसे भी जिया जा सकता है “जब भीतर शांति जागती है, तो जीवन को प्रेम, करुणा और मानवता के साथ ऐसे भी जिया जा सकता है।” ऐसे भी जिया जा सकता है — क्या मनुष्य अपने भीतर से दुनिया को बदल सकता है? कभी-कभी हम दुनिया को देखते हैं और सोचते हैं— लोग इतने परेशान क्यों हैं? इतनी ईर्ष्या क्यों है? इतना लोभ क्यों है? इतना संघर्ष क्यों है? मनुष्य मनुष्य से इतना दूर क्यों होता जा रहा है? फिर हम सोचते हैं कि दुनिया को बदलने के लिए बहुत कुछ करना पड़ेगा। बड़ी व्यवस्थाएँ बदलनी होंगी। बड़े निर्णय लेने होंगे। लेकिन शायद एक और रास्ता है। शायद शुरुआत बहुत छोटी हो सकती है। शायद शुरुआत मेरे और आपके बीच से हो सकती है। शायद जीवन को थोड़ा अलग ढंग से जिया जा सकता है। ऐसे भी जिया जा सकता है। सुबह की शुरुआत थोड़ी अलग हो सकती है सुबह आँख खुलते ही हमारा हाथ अक्सर मोबाइल की ओर बढ़ता है। समाचार, संदेश, काम, बाजार, दुनिया की भागदौड़—सब कुछ हमारे सामने आ जाता है। लेकिन कभी एक सुबह ऐसी भी हो सकती है जब हम कुछ क्षण चुप रहें। आँखें बंद करें। एक गहरी साँस लें। और मन ही मन कहे...

कर्ण को दुःख क्यों मिला

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 कर्ण का प्रश्न और श्रीकृष्ण का धर्म एवं विवेक का संदेश कर्ण की निष्ठा और श्रीकृष्ण के धर्म-संदेश के बीच जीवन के सही चुनाव का गहरा प्रश्न। कर्ण ने पूछा—“मैंने सत्य के लिए संघर्ष किया, फिर मुझे दुखक्यों मिला?” श्रीकृष्ण का गहरा संदेश। कर्ण के जीवन की पीड़ा, दुर्योधन के प्रति उसकी निष्ठा और श्रीकृष्ण द्वारा दिखाए गए धर्म के मार्ग से समझिए कि जीवन में केवल अच्छे गुण ही नहीं, बल्कि सही चुनाव भी क्यों आवश्यक है। कर्ण ने पूछा—“मैंने सत्य के लिए संघर्ष किया, फिर मुझे दुख क्यों मिला?” ॐ नमः शिवाय। महाभारत केवल एक युद्ध की कथा नहीं है। यह मनुष्य के भीतर चलने वाले संघर्ष की भी कथा है। इसमें ऐसे पात्र हैं, जिनमें महान गुण भी हैं और गंभीर कमजोरियाँ भी। कर्ण उन्हीं पात्रों में से एक है। कर्ण का जीवन जितना संघर्षपूर्ण था, उतना ही विचार करने योग्य भी। वह महान योद्धा था। वह दानवीर था। वह अपने मित्र के प्रति अत्यंत निष्ठावान था। उसने जीवन में अपमान सहा, संघर्ष किया और बार-बार स्वयं को सिद्ध किया। फिर भी उसके जीवन का अंत अत्यंत दुखद परिस्थितियों में हुआ। यहीं से एक प्रश्न उठता है— यदि क...

भगवान शिव के स्मरण का सही समय क्या है? जानिए शिव-स्मरण की सरल साधना

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 भगवान शिव के स्मरण का सही समय और ब्रह्म मुहूर्त में शिव ध्यान भगवान शिव का स्मरण किसी एक निश्चित समय तक सीमित नहीं है। ब्रह्म मुहूर्त, प्रातःकाल, संध्या और रात्रि—हर समय शिव-स्मरण किया जा सकता है। जानिए शिव-स्मरण का सबसे सुंदर और सरल मार्ग। भगवान शिव के स्मरण का सही समय क्या है? ॐ नमः शिवाय। भगवान शिव का स्मरण करने के लिए क्या कोई निश्चित समय होता है? क्या शिवजी का ध्यान केवल प्रातःकाल या ब्रह्म मुहूर्त में ही करना चाहिए? या फिर दिन के किसी भी समय महादेव का स्मरण किया जा सकता है? यह प्रश्न जितना सरल दिखाई देता है, उतना ही गहरा है। भगवान शिव का स्मरण केवल पूजा की एक क्रिया नहीं है। यह मन को संसार की चंचलता से हटाकर भीतर की शांति और चेतना की ओर ले जाने का माध्यम है। इसलिए शिव-स्मरण का सबसे महत्वपूर्ण समय वह है, जब मन श्रद्धा और एकाग्रता के साथ महादेव की ओर मुड़ सके। फिर भी कुछ समय ऐसे हैं, जिन्हें साधना और शिव-स्मरण के लिए विशेष रूप से अनुकूल माना गया है। 1. ब्रह्म मुहूर्त — शिव-स्मरण का श्रेष्ठ समय रात्रि के अंतिम प्रहर और सूर्योदय से पहले का समय ब्रह्म मुहूर्त कहलाता है। इ...

मनुष्य में दिव्य चेतना कैसे जागती है? | तप, ज्ञान और योग से चेतना के रूपांतरण का रहस्य

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  मनुष्य में दिव्य चेतना का जागरण तप, ज्ञान, योग और भक्ति के माध्यम से भीतर की चेतना के जागरण का प्रतीक। मनुष्य में दिव्य चेतना कैसे जागती है? | तप, ज्ञान और योग से चेतना के रूपांतरण का रहस्य क्या मनुष्य केवल शरीर और मस्तिष्क है? मनुष्य अपने जीवन को सामान्यतः शरीर और मस्तिष्क के स्तर पर समझता है। हम कहते हैं— मैं देखता हूँ। मैं सुनता हूँ। मैं सोचता हूँ। मैं निर्णय लेता हूँ। मैं सुखी हूँ। मैं दुखी हूँ। लेकिन इन सभी अनुभवों के पीछे एक और गहरी सत्ता है, जिसे भारतीय दर्शन ने चेतना के रूप में देखा है। शरीर बदलता है। विचार बदलते हैं। भावनाएँ बदलती हैं। इच्छाएँ बदलती हैं। लेकिन जो इन सबके परिवर्तन को जानता है, वह कौन है? यहीं से आध्यात्मिक मंथन प्रारंभ होता है। हमारे पिछले लेख में महर्षि वेदव्यास के असाधारण व्यक्तित्व के माध्यम से यह प्रश्न उठाया गया था कि मनुष्य तप, ज्ञान और योग के द्वारा कितनी ऊँचाई तक पहुँच सकता है। लेकिन अब प्रश्न उससे भी गहरा है— वह आंतरिक परिवर्तन होता कैसे है? क्या कोई मनुष्य जन्म से ही असाधारण होता है? या साधना धीरे-धीरे उसकी चेतना को बदलती ह...