परमात्मा कहाँ है? एक साधक की दृष्टि
नागमती का विरह, मंदिरों की शांति और मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य आज का मनुष्य विज्ञान, तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में जी रहा है। वह अंतरिक्ष की खोज कर रहा है, सुपर कंप्यूटर बना रहा है और प्रकृति के अनेक रहस्यों को समझने का प्रयास कर रहा है। यह प्रगति स्वागत योग्य है, परंतु एक प्रश्न आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना हजारों वर्ष पहले था— मैं कौन हूँ और इस जीवन का उद्देश्य क्या है? हमारे ऋषि-मुनियों ने जिन सत्यों का अनुभव किया, उन्हें उन्होंने सीधे शब्दों में नहीं, बल्कि प्रतीकों, कथाओं और शास्त्रों के माध्यम से व्यक्त किया। नागमती का विरह भी ऐसा ही एक प्रतीक है। यह केवल एक स्त्री का अपने प्रिय से बिछोह नहीं, बल्कि आत्मा की परमात्मा के प्रति तड़प का संकेत है। जो साधक इस विरह को समझता है, वह जानता है कि मनुष्य के भीतर एक ऐसी खोज चलती रहती है जिसे केवल भौतिक उपलब्धियाँ शांत नहीं कर सकतीं। यही कारण है कि अध्यात्म की परंपरा आज भी जीवित है। दुर्भाग्य से आज अनेक लोग बिना जाने, बिना पढ़े और बिना अनुभव किए ही परमात्मा के अस्तित्व को नकार देते हैं। किसी भी विषय को समझने से पहले...