Thursday, 4 March 2021

Shiva 1माता पार्वती जी की परीक्षा


 माता पार्वती जी की परीक्षा 

शिव जी की आराधना मेंं  स्वंय  माता पार्वती जी को भी परीक्षा देनी पडी ।

एक बार भगवान  शिव को  पति के रूप में पाने  के लिए माता पार्वती जी ने भगवान शिव जी की घोर तपस्या प्रारंभ की ।

शुरुआती  दौर में  माता पार्वती जी ने  अन्न का त्याग कर दिया ।

फिर  सैकडों  वर्ष  बीतने  पर भोलेनाथ के  दर्शन नहीं हुए तो उन्होंने  और घोर तपस्या प्रारंभ की इस बीच केवल पेड़ के कोमल पत्ते ही आहार में  लेती थी ।

इस प्रकार की घोर तपस्या से भगवान शिवजी विचलित हो गये ।एवं  अपनी  होने  वाली  अर्धांगनी को जानने के लिए उन्होंने परीक्षा लेने का मन बनाया ।

हम लोग  भी अपनी होने वाली पत्नी को जानने के लिए कुछ जरूर सोचते हैं ।

जब भगवान शिव जी ने  परीक्षा ली तब सप्त ऋषियों को बुलाया एवं यह कहा कि ,आप लोग पार्वती जी के सामने जाकर मेरी खूब  निंदा कीजिये । पहले तो सप्त ऋषियों ने  मना कर दिया, परन्तु भगवान शिव जी की अवहेलना नहीं कर सकते थे ।इसलिए उन्होंने जाकर  माता पार्वती जी के सामने भगवान शिव  जी की काफी निंदा की।

परन्तु  माता पार्वती जी भगवान शिव के विरुद्ध एक शब्द भी सुनना नहीं चाहती थी ।तब  अन्त में सप्त ऋषियों ने हार मान ली ,एवं माता पार्वती जी को आशीर्वाद देकर वापस  कैलाश लौट आए ।

जब भगवान शिव जी ने  पूछा ,तो वह बोले कि प्रभु माता पार्वती जी की  हमने  हर तरह से  परीक्षा ली, परन्तु भगवन  वह  आपके प्रति  अगाध प्रेम एवं श्रद्धा  रखती है ।

संसार में कोई भी व्यक्ति  उनकी श्रद्धा को डिगा  नहीं सकता ।तब भगवान शिव जी बोले कि हे सप्त ऋषि आप लोगों का बहुत धन्यवाद, अब आप लोग अपने धाम को लौट जाए। 

फिर  भगवान शिव जी  ने  माता पार्वती जी  की स्वंय परीक्षा ली।

माता पार्वती जी  जहाँ  तपस्या कर रही  थी, वही पास में एक सरोवर  था । जैसे ही वह तपस्या कर के  उठी,  तब तक उन्हे एक बालक  की करूण पुकार सुनाई दी, बचाओ, बचाओ ,माता पार्वती जी दौड़ कर  वहां गयी  एवं देखती  है कि एक बालक को एक विशालकाय  मगरमच्छ ने अपने  मुँह में  जकड़ रखा है ।एवं  बालक दर्द ,एवं भय से  छटपटा रहा है ,माता पार्वती जी को देखकर बालक  बोला  कि हे माता  मेरी माता नही है, पिता भी नहीं है  मेरा कोई  भी नहीं  है  आप मुझे  इस मगरमच्छ से बचा लीजिए ।

यह सब देखकर कर करुणामयी माता पार्वती जी ने मगरमच्छ से प्रार्थना की कि वह बालक को छोड़ दें , तब मगरमच्छ बोला कि  शर्त पर   बालक को छोड़ दूंगा, कि आप  मुझे अपनी तपस्या का  पूरा फल दे दें ।तब  माता पार्वती जी बोलीं कि ठीक है , तब मगरमच्छ बोला कि फिर  से  तुम्हे हजारो वर्ष  भगवान शिव की प्राप्ति के  लिए तपस्या करनी  पड़ेगी ।

माता पार्वती जी ने कहा कोई  बात नहीं, एवं  अपनी तपस्या का पूरा फल मगरमच्छ  को दे दिया ।तब माता पार्वती जी के तपस्या के प्रभाव से मगरमच्छ का शरीर तेज से जगमगा उठा।

 तब मगरमच्छ बोला कि एक बार और सोच लीजिए , लेकिन माता पार्वती जी ने कहा नहीं ,आप  बालक को छोड़ दीजिए ।तब मगरमच्छ  ने  बालक को छोड़ दिया ,तब माता पार्वती जी फिर नये सिरे से भगवान शिव जी की तपस्या के लिए बैठी। तब भगवान शिव जी प्रसन्न  होकर  माता पार्वती जी के सामनेप्रकट हुए ,एवं कहा कि मैं  आपकी श्रद्धा एवं निष्ठा से  प्रसन्न होकर आपको अपनी  पत्नी स्वीकार करता हूँ ।

दरअसल  मै आपकी  परीक्षा ले  रहा था , मै ही बालक एवं मगरमच्छ  दोनों के रूप में मै ही  था, यह कहकर भगवान शिव जी अंतर्धान  हो गये ।

            ऊँ   नमःशिवाय 

Shiva महाशिवरात्रि

                महाशिवरात्रि 


मनुष्य  अपनी  सीमाओं से परे  जा कर भी  अधिक से अधिकतम  प्राप्त कर सकता है । भगवान शिवजी के पूजन से व्यक्ति का रूपांतरण होने  लगता है । वह अपने भीतर की ओर उतरता चला जाता है ,तब जाकर वह नयी चेतनाओ के  आयाम पाता है । जिससे कि  विश्व कल्याण हेतु  नई तकनीकी का उसको ज्ञान प्राप्त होता है ।

ऊँ नमःशिवाय मंत्र हमारे अन्दर की बनावट को  शुद्ध करता है ।एवं  इससे  और गहराई से ध्यान लगता है ।

ज्यों-ज्यों  मंत्र की आवृत्ति  बढती  जाती हैं,  साधक गहराई की ओर उतरने  लगता है । इसे महामंत्र  की  संज्ञा दी गयी है ।इस मंत्र को पंचाक्षर कहा गया है । जो कि प्रकृति  में मौजूद पाँच तत्वों का  प्रतीक है । और शरीर के पाँच मुख्य केंन्द्रो का भी प्रतीक है ।

महाशिवरात्रि  को सर्वाधिक  महत्वपूर्ण माना जाता है । जो फरवरी या मार्च  के महीने में  आती है । एवं इसी रात प्रकृति मनुष्य को  उसके आध्यात्मिक  शिखर तक जाने में मदद प्रदान करती है।    

           ऊँ नमःशिवाय 




Tuesday, 2 March 2021

Shiva


 भगवान शिवजी  किस प्रकार  से  खुश होते हैं 

एक  बार की बात है कि  माता पार्वती  जी ने  प्रश्न किया कि प्रभु सबसे पहले मुझे यह बताने का कष्ट करें । कि आपको प्रसन्न  करने के लिए किस प्रकार की पूजा, प्रार्थना, योग किया जाय कि आप प्रसन्न होते हैं ।

भगवान शिवजी बोले कि आपने  बहुत ही सुन्दर प्रश्न किया है 

मुझे यदि  ध्यान  करना हो तो  मेरे  लिंङ्ग का ध्यान करना चाहिए ।

एवं  मै प्रसन्न केवल श्रद्धा से होता हूँ ।अन्य  किसी साधन के  द्वारा नहीं  ।

अत्यंत  श्रद्धा  से ही  मैं  प्रसन्न  होता  हूँ ।

                    ऊँ नमःशिवाय 

 


 

Sunday, 28 February 2021

Shiva

शिव तत्व 



भगवान शिव की कृपा हम पर सदैव बनी रहे ऐसे परम दयालु, भक्त वत्सल, करूणा के सागर परब्रह्म परमेश्वर शिवजी के प्रसाद से ही ज्ञान होता है ।

भगवान शिवजी  सभी  प्रकार की चिन्ताओ से मुक्त है। इसलिए  उन्होंने सारे कार्य का वितरण उचित एवं योग्य देवताओं  में कर दिया है । जाकि सृष्टि का कार्य  निर्बाध रूप से चलता रहे। एवं स्वंय भगवान शिव इस चिन्ता तथा अन्य सभी चिंन्ताओ से मुक्त हो  कर  समाधि में  परम शान्ति में लीन रहते हैं ।

देवताओं से लेकर पिशाच आदि  तक सभी के स्वामी भगवान शिवजी  ही है ।

 सभी प्रकार के अर्थ एवं ज्ञान  का प्राप्त होना  योग कहलाता है। एवं इसका ज्ञान हमारे ॠषि -मुनियों  को था। जो शिवजी की कृपा से ही   प्राप्त होताहै ।

हमें सदैव ओंकार का  ही जप करना  चाहिए ।

भगवान शिव को जानने के लिए शिव तत्व का साक्षात्कार  करना अत्यंत  आवश्यक है । गले से नीचे  और  नाभि से ऊपर  करीब  एक  बालिस्त की दूरी  पर और दोनों भौंहों के मध्य  में  योग  स्थान कहे गये हैं ।

 भगवान शिवजी की आराधना एवं कृपा से जो ज्ञान प्राप्त होता वह स्वर्ग के  देवताओं को भी दुर्लभ है।

                          ऊँ नमःशिवाय 





 







Thursday, 25 February 2021

Shiva


 भगवान शिवजी भोग एवं  मोक्ष दोनोंं  को प्रदान करते हैंं।

इसमें रत्ती भर भी संदेह नहीं है ।भावना से  भक्ति होती है एवं भक्ति से मुक्ति होती है । माया से आच्छादित जीव अपने प्रारब्ध  के कर्मों के कारण  संसार में आता है ।एवं  अपने कर्मों के  अनुसार विभिन्न योनियो में रहकर फिर चला जाता ।

अठारह  पुराणों में  भगवान शिव की महान महिमा का वर्णन केवल  लिंग पुराण में बताया गया है । एवं  यह 11000 श्लोको मे  किया गया है।

भगवान शिवजी अव्यक्त  लिंग  बीज के रूप मे इस सृष्टि के पूर्व में स्थित है । एवं शिव व्यक्त भी है तथा अव्यक्त भी है ।शिवलिंग  भगवान शिव की साकार  मूर्ति है ।

लिंग पुराण में सृष्टि की उत्पत्ति पाँच भूतों के द्वारा बतायी गयी है, और यह है, आकाश, वायु, अग्नि, जल , एवं पृथ्वी ।

भगवान शिवजी ऐसे लोगों से प्रसन्न होते है, जो संयमी, धार्मिक, दयावान, तपस्वी, साधु, सन्यासी, सत्यवादी ,वेदों और स्मृतियो के ज्ञाता तथा धर्म मे आस्था रखते हैं ।

Friday, 1 January 2021

शिव रहस्य, भगवान शिव जी को कैसे जाने,भगवान शिव जी की महत्वपूर्ण बातें

 भगवान शिव जी के समबन्ध में महत्वपूर्ण बातें, शिव जी का रहस्य, शिव जी को कैसे जाने आदि बातों का आज हम जानेगे। 

शिव जी के चरणों में नूतन वर्ष का अभिनंदन 

नूतन नवीन वर्ष  पूरे  विश्व में समद्धि  लाए विश्व को इस कोरोना महामारी से मुक्ति दिलाये। सर्वत्र शान्ति  व्याप्त हो, मौसम अनुकूल हो, मानवता का साम्राज्य आये। विश्व  बन्धुत्व कायम रहे,  नित्य नवीन गुलाबी  रंग से  बाल जगत चहकता रहे।

कोरोना  के भय एवं, दंश से मुक्ति  मिले इन सब कामनाओं को देवाधिदेव महादेव शिव जी  के चरणों  में  रखकर प्रार्थना करता हूँ ।

सर्वेश्वर भगवान शिव जी अनादि काल से विश्व में अपनी लीला कर रहे हैं । जो भी घटित होता है वह सब शिव जी की इच्छा से होता है । विज्ञान अभी इतना सार्थक नहीं है कि ईश्वर की जगह ले सके , प्राचीन काल में  बहुत बडे,बडे यज्ञ होते थे  जिनके प्रभाव से  वातावरण अनुकूल होता था । लोग में  आध्यात्मिक उन्नति होती थी।

पूरी  दुनिया के  सामने जब एक महामारी चुनौती बन सकती है। तो  शिव जी को समझना कितनी बडी बात है ।

शास्त्रों के अनुसार शिव जी को भक्ति से प्राप्त किया जा सकता है । परन्तु  यहाँ  मानव स्वभाव यह है कि हम प्रेम भी उसी से करते हैं जिसको  हम देखते हैं, स्पर्श, करते  हैं बातें करते हैं । एवं  वह हमारा प्रेमी हो  जाता है । वह किसी से भी  हो  सकता है । एवं  उसके  बिछड़ने पर हम व्याकुल  हो जातें हैं । यही व्याकुलता  हमें  शिव जी के प्रति चाहिए । तब जाकर हम शिव तत्व को जानने की पहली सीढ़ी पर चढेगे एवं यही  पहली सीढ़ी हमें अपने अन्तिम पायदान पर पहुंचा कर शिवजी को जानने का मार्ग प्रशस्त करती है ।

ऊँ  नमःशिवाय,  ऊँ नमःशिवाय, ऊँ नमःशिवाय, ऊँ नमःशिवाय, ऊँ नमःशिवाय, ऊँ नमःशिवाय, ऊँ नमःशिवाय, ऊँ नमःशिवाय  भगवान शिव जी हम सभी पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखे ।

Wednesday, 30 December 2020

Shiva

 


 शिव के  रहस्य को  न किसी  ने  जाना है  न कोई जान पाएगा क्यो कि शिव ही ऐसे भगवान है  जो साधक  को खुली छूट   दे कर ,रखते हैं कि  वह  सम्पूर्ण  शक्ति के  साथ  अपनेे आराध्य को जाानने  का प्रयास करे।

परन्तु  अत्यंत  ध्यान  देने वाली बात है कि शिव,विष्णु, एवं ब्रह्म जी केवल स्वरूप से भिन्न है तत्वत: इनमे कोई भेद नहीं है।
शिव का ध्यान,पूजा, मनन मनुष्य को शूद्र  से  विराट  में  जोडता है । कुटुम्ब से  उपर उठकर विश्व कुटुम्ब की धारणा मन मे लाता है । एवं व्यक्ति तब कुछ  कल्याण के लिए सोचता है । एवं उसकी  यही  सोच मानव की प्रगति  का मार्ग प्रशस्त करती है ।मूलतः शिव साधना अपना एवं विश्व कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है ।

Shiva 1माता पार्वती जी की परीक्षा

 माता पार्वती जी की परीक्षा  शिव जी की आराधना मेंं  स्वंय  माता पार्वती जी को भी परीक्षा देनी पडी । एक बार भगवान  शिव को  पति के रूप में पान...