रावण ने शिवभक्ति का प्रचार क्यों नहीं किया? | शिवभक्ति और अहंकार का रहस्य
रावण की शिवभक्ति महान थी, लेकिन सच्ची भक्ति केवल आराधना नहीं, बल्कि भगवान के गुणों को जीवन में उतारना भी है। रावण का नाम आते ही दो बातें एक साथ स्मरण होती हैं—उसका अद्भुत ज्ञान और उसकी भगवान शिव के प्रति अटूट भक्ति। उसने कठोर तपस्या की, भगवान शिव को प्रसन्न किया और शिव तांडव स्तोत्र जैसी अद्भुत स्तुति का रचनाकार भी माना जाता है। फिर भी एक प्रश्न मन में उठता है—यदि रावण इतना महान शिवभक्त था, तो उसने संसार में शिवभक्ति का प्रचार क्यों नहीं किया? इस प्रश्न का उत्तर केवल कथा में नहीं, बल्कि उसके चरित्र में छिपा है। रावण की भक्ति अत्यंत प्रबल थी, लेकिन उसका मुख्य उद्देश्य भगवान शिव के गुणों को अपने जीवन में उतारना नहीं, बल्कि उनसे शक्ति, वरदान और अपराजेयता प्राप्त करना था। उसने भगवान शिव की उपासना अवश्य की, परंतु उनके वैराग्य, करुणा, विनम्रता और लोककल्याण के आदर्शों को पूर्ण रूप से अपने जीवन में नहीं अपनाया। यही कारण है कि रावण एक महान तपस्वी और शिवभक्त तो बना, परंतु लोकगुरु नहीं बन सका। इसके विपरीत भगवान हनुमान को देखिए। उन्होंने कभी स्वयं को महान भक्त नहीं कहा, कभी भक्ति का प्रदर्शन न...