जब कोई इच्छा शेष नहीं रहती, तब मन कहाँ जाता है? | उपनिषद, गीता और शिवदर्शन का रहस्य
इ जब सभी इच्छाएँ शांत हो जाती हैं, तब मन बाहर नहीं भटकता बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप की ओर लौटने लगता है। जब कोई इच्छा शेष नहीं रहती, तब मन कहाँ जाता है? भूमिका साधना के मार्ग पर एक समय ऐसा भी आता है जब साधक अपने भीतर एक अद्भुत परिवर्तन अनुभव करता है। संसार की वस्तुओं की चाह धीरे-धीरे कम होने लगती है। सम्मान मिले या न मिले, सफलता मिले या न मिले, मन पहले जैसा विचलित नहीं होता। धीरे-धीरे एक और गहरा परिवर्तन होता है। साधक को यह भी अनुभव होने लगता है कि अब परमात्मा को पाने की भी वैसी व्याकुल इच्छा नहीं रही, जैसी पहले थी। यहीं एक अत्यंत सूक्ष्म प्रश्न जन्म लेता है— "जब किसी वस्तु की इच्छा नहीं रहती, यहाँ तक कि परमात्मा की भी नहीं, तब मन कहाँ जाता है?" क्या यह साधना का अंत है? या यहीं से आत्मबोध की वास्तविक यात्रा प्रारम्भ होती है? इस प्रश्न का उत्तर वेद, उपनिषद, भगवद्गीता तथा शिवदर्शन की सहायता से समझने का प्रयास करते हैं। इच्छा का स्वभाव क्या है? सामान्यतः मन किसी न किसी वस्तु की ओर दौड़ता रहता है। कभी धन की इच्छा, कभी सम्मान की, कभी सफलता की, कभी ज्ञान की और कभी ईश्व...