श्री गणेश जी की उत्पत्ति की शिवपुराणीय कथा | गजमुख गणेश का रहस्य
श्री गणेश जी की उत्पत्ति की शिवपुराणीय कथा
नारद जी का प्रश्न
एक समय देवर्षि नारद ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। उन्होंने विनम्र भाव से पूछा कि आपने भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय के जन्म और पराक्रम का वर्णन तो किया है, परंतु गणेश जी की उत्पत्ति कैसे हुई, यह जानने की मेरी गहन जिज्ञासा है।
ब्रह्मा जी मुस्कराए और बोले—नारद, यह प्रश्न साधारण नहीं है। यह कथा केवल जन्म की नहीं, बल्कि आज्ञा, अहंकार और बुद्धि के प्राकट्य की दिव्य लीला है।
माता पार्वती का विचार
कैलास पर्वत पर एक दिन माता पार्वती अपनी सखियों जया और विजया के साथ बैठी थीं। सखियों ने कहा कि शिवगण तो हमारे भी हैं, परंतु वे केवल शिव की आज्ञा मानते हैं। क्या माता का भी कोई ऐसा सेवक नहीं होना चाहिए जो केवल उनकी आज्ञा का पालन करे?
माता पार्वती ने उस समय कुछ नहीं कहा, किंतु यह विचार उनके हृदय में गहराई से उतर गया और समय आने पर संकल्प बन गया।
गणेश जी की रचना
एक दिन स्नान करते समय माता पार्वती को द्वारपाल की आवश्यकता का अनुभव हुआ। भगवान शिव के चले जाने के बाद उन्होंने अपने शरीर के उबटन से एक सुंदर बालक की रचना की और उसमें प्राण फूँक दिए।
बालक जीवित हो उठा। माता ने उसे हृदय से लगाया, उसका नाम गणेश रखा और द्वार पर पहरा देने की आज्ञा दी। गणेश जी ने माता की आज्ञा को सर्वोपरि मानकर स्वीकार किया।
शिव लीला और गजमुख
जब भगवान शिव लौटे और प्रवेश करना चाहा, तो गणेश जी ने उन्हें रोक दिया। शिवगण और देवता भी गणेश जी को परास्त न कर सके। अंततः शिव के त्रिशूल से गणेश जी का मस्तक विच्छेद हुआ।
माता पार्वती जगदंबा रूप में प्रकट हुईं। उनके क्रोध से सृष्टि काँप उठी। तब हाथी का मस्तक लाकर गणेश जी को जीवित किया गया और गजमुख गणेश का दिव्य प्राकट्य हुआ।

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