Shiv katha sawan special"रावण और शिवभक्ति की अद्भुत कथा"
शिवभक्त रावण — कथा (रंगीन चलता मंत्र) शिवभक्त रावण — आत्मलिंग की कथा भक्ति, परीक्षा और सीख — ॐ त्र्यंबकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् — उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ यह कथा रावण की भक्ति, उसकी परीक्षा और उससे मिलने वाला पाठ है — पारंपरिक लोककथाओं के आधार पर संक्षेप में प्रस्तुत। प्रारम्भ — भूल और संकल्प रावण कैलास से भगवान शिव का चंद्रहास लेकर लौटा, पर उसकी माता कैकसी ने हठ से कहा कि उन्हें स्वयं शिव चाहिए थे — केवल शस्त्र नहीं। यह शब्द रावण को अंदर तक झकझोर गया और उसने प्रण किया कि वह अगली बार शिव को स्वयं लाएगा। तपस्या और अद्भुत भक्ति रावण ने कैलास पर कठोर तप किया। वर्षों तक उसने निरंतर साधना की — कहा जाता है उसने अत्यंत कठिन तप के रूपों में आंतों से वीणा बनाई और 'ॐ नमः शिवाय' का जप किया। उसकी भक्ति देख माता पार्वती ने कहा कि अब उसे दर्शन दिए जाएँ। दर्शन, इच्छा और चेतावनी भगवान शिव माता पार्वती के साथ प्रकट हुए। शिव ने पूछा — वर क्या चाहो...