नीलकंठ संवाद – भाग 5: कांवड़ यात्रा — भीतर की तपस्या
"जहाँ शब्द मौन हो जाए, वहीं से नीलकंठ संवाद प्रारंभ होता है।" 🌿 नीलकंठ संवाद – भाग 5 चित्र का निर्माण AI के सौजन्य से हुआ है।(कांवड़ यात्रा — भीतर की तपस्या) “ कांवड़ चलती है तो सिर पर जल नहीं होता — हृदय में संकल्प होता है।” 🕉️ प्रस्तावना: श्रावण की पहली वर्षा और पहला संकल्प श्रावण मास की पहली वर्षा से पहले ही मन भीग चुका था। एक विशेष प्रकार की आहट थी — जैसे धरती शिव को पुकार रही हो। शिवलिंग की ओर नदियों के जल नहीं, बल्कि हृदय के संकल्प बह रहे थे। कांवड़ यात्रा प्रारंभ हो चुकी थी — लेकिन यह केवल एक बाहरी यात्रा नहीं थी। यह वह भीतर की तपस्या थी, जहाँ हर कदम, हर कांटा, हर बूँद पसीना — एक जप बन जाता है: “बोल बम… बोल बम…” 🔱 कांवड़ क्या है? एक पवित्र प्रतीक कांवड़ केवल बांस और दो कलशों की रचना नहीं है। यह उस नंगे पांव चलने वाले संन्यासी का प्रतीक है जिसने जीवन की समस्त इच्छाओं को गंगाजल में घोलकर शिव तक पहुंचाने का संकल्प लिया है। कांवड़ सिर पर नहीं उठाई जाती — यह हृदय पर टिकी होती है। जब कोई कांवड़िया चलता है, तो वास्तव में वह अपने भीतर के विषों को नीलकंठ को सौंपने चल रहा ...