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भोलेनाथ — क्यों कहा गया भगवान शिव को “भोले”

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यह चित्र AI के द्वारा निर्मित है 🔱 भगवान शिव को “भोले” क्यों कहा गया? ॐ अजय स्मरामि 1. “भोला” शब्द का वास्तविक अर्थ लोग साधारणतः “भोला” का अर्थ सीधा-सादा या जल्दी प्रसन्न होने वाला समझते हैं, परंतु संस्कृत में “भोला” का अर्थ है — “जो बिना छल-कपट के, निर्मल मन से सबको स्वीकार कर ले।” यानी भोलेनाथ का भोला होना सीधापन नहीं, बल्कि पूर्ण निष्कपटता और करुणा का प्रतीक है। 2. बिना भेदभाव के कृपा करना भगवान शिव देवता और असुर — दोनों को समान दृष्टि से देखते हैं। जिसने भी श्रद्धा से पुकारा, चाहे वह रावण हो या बाणासुर — उन्होंने सब पर कृपा की। इसलिए उन्हें कहा गया — “आशुतोष” — जो आसानी से तुष्ट हो जाते हैं। इसी भाव से भक्त प्रेमपूर्वक कहते हैं — “भोलेनाथ।” 3. भोलेपन में भी गूढ़ ज्ञान छिपा है यह भोला स्वभाव अज्ञान नहीं, बल्कि परम ज्ञान के पार की सरलता है। जिसने ब्रह्म का साक्षात्कार कर लिया हो, उसके लिए किसी से छल करने का कारण ही नहीं बचता। भोलेनाथ का भोला स्वभाव अद्वैत की पूर्णता का प्रतीक है। 4. भक्त के लि...

मां आदिशक्ति का दिव्य प्राकट्य: देवताओं को मिला साक्षात दर्शन

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मां आदिशक्ति का देवताओं को दर्शन देवताओं के द्वारा मां आदिशक्ति की स्तुति हिमालय से लौटने के बाद सभी देवताओं ने मिलकर माता आदिशक्ति की स्तुति की। उन्होंने कहा — हे माता , आप चर और अचर की स्वामिनी हैं, आपने ही इस संपूर्ण विश्व को धारण कर रखा है। आप सभी के हृदय में निवास करती हैं और प्राणियों की देखभाल करती हैं। आप वेदों में सामवेद की ऋचाएं हैं, अथर्ववेद में सम्मोहन शक्ति भी आप ही हैं। आप अनंत ज्ञान की जननी हैं। हे जगत जननी , आपने सती रूप में जन्म लेकर विश्व का कल्याण किया, कृपया हमें दर्शन देकर पुनः कल्याण करें। मां आदिशक्ति का देवताओं को दर्शन देना देवताओं की पुकार सुनकर मां आदिशक्ति का हृदय द्रवित हो गया। वे एक दिव्य रथ में प्रकट हुईं। रथ में नीलम जड़े हुए थे, और मुलायम गद्दों से सुसज्जित था। दिव्य शक्ति की आभा मां के अंगों से करोड़ों सूर्य के समान प्रकाश निकल रहा था। देवताओं की आंखें चौंधिया गईं और वे मां के रूप को न देख सके। तब विष्णु और ब्रह्मा जी ने प्रार्थना की: "हे माता, दिव्य दृष्टि दीजिए।" मां ने दिव्य दृष्टि दी , जिससे देवताओं ने मह...

"शिव विवाह की पौराणिक कथा: ब्रह्मा-विष्णु का कैलाश गमन और भगवान शिव की विवाह शर्त"

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, भगवान शिव ध्यान में लीन हैं, चारों ओर देवगण खड़े हैं – ब्रह्मा, विष्णु सहित। कैलाश पर्वत की पृष्ठभूमि, पुष्पवर्षा हो रही है, शीतल वातावरण है। 🔱 शिव विवाह की दिव्य कथा 🔱 ब्रह्मा और विष्णु का कैलाश गमन एक बार ब्रह्मा जी और विष्णु जी आपस में चर्चा कर रहे थे। ब्रह्मा जी ने कहा — "मेरा विवाह हो चुका है, और विष्णु जी, आपका भी विवाह हो चुका है। अब केवल भगवान शंकर ही अविवाहित हैं। हमें महेश्वर से निवेदन करना चाहिए कि वे विवाह करें। क्योंकि कुछ राक्षसों का अंत उनके पुत्र द्वारा होना लिखा है, और पुत्र तभी संभव है जब भगवान शिव विवाह करें।" यह कहकर दोनों देवता अन्य देवताओं सहित कैलाश पर्वत की ओर प्रस्थान करते हैं। भगवान शिव के दर्शन कैलाश पर पहुँचकर सभी देवताओं को भगवान शिव ध्यानस्थ अवस्था में दिखाई देते हैं। उनके शरीर से कर्पूर जैसी आभा निकल रही थी और चारों ओर शीतल पवन बह रही थी। पुष्पों की वर्षा हो रही थी और वातावरण अत्यंत आनंदमय था। सभी देवता हाथ जोड़कर खड़े हो गए और समाधि टूटने की प्रतीक्षा करने लगे। समा...

कैलाश पर्वत का लिंग पुराण में वर्णन और उसका आध्यात्मिक महत्व

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लिंग महापुराण के अनुसार कैलाश पर्वत और महादेव जी का दिव्य निवास लिंग महापुराण के अनुसार कैलाश पर्वत और महादेव जी का दिव्य निवास श्री लिंग महापुराण में वर्णित कैलाश का पौराणिक और आध्यात्मिक चित्रण — श्रद्धा के साथ। लेख: अजय कुमार • स्रोत: श्री लिंग महापुराण परिचय कैलाश पर्वत का नाम सुनते ही हर शिवभक्त के हृदय में श्रद्धा और भक्ति जागृत होती है। लिंग महापुराण में कैलाश पर्वत का अत्यंत दिव्य और अद्भुत वर्णन मिलता है — जहाँ भगवान शंकर अपने परिवार सहित विराजमान रहते हैं। कैलाश पर्वत का वैभव चोटियाँ स्वर्ण, माणिक्य, नीलम, गोमेद और अन्य बहुमूल्य रत्नों से निर्मित हैं। पर्वत पर सौ हजार शाखाएँ हैं और चंपक, अशोक, पारिजात जैसे दिव्य वृक्ष लहलहाते हैं। जल सरोवर पुष्पगुच्छों से भरे रहते हैं और विविध पक्षियों का मधुर कलरव वातावरण को पवित्र बनाता है। भूतवन — एक रहस्यमयी वन कैलाश पर स्थित भूतवन गहरी जड़ों वाले वृक्षों, घनी छाया और अद्भुत फल-फूलों से युक्त है। धार्मिक मान्यताओं के अन...