स्वामी कार्तिकेय एवं गणेश विवाह प्रसंग | शिव–पार्वती की दिव्य लीला
स्वामी कार्तिकेय एवं गणेश विवाह प्रसंग : शिव–पार्वती की दिव्य लीला
🔱 गणेश जी और कार्तिकेय की दिव्य लीला
भगवान शिव और माता पार्वती कुमार कार्तिकेय एवं श्री गणेश जी की सुंदर क्रीड़ाओं को देखकर अपार हर्ष महसूस कर रहे थे।
भगवान शिव ने दोनों बच्चों को बुलाकर कहा कि हम चाहते हैं कि आप दोनों का विवाह हो, लेकिन हमारी शर्त है कि जो पृथ्वी की परिक्रमा पहले करेगा, वही सर्वप्रथम विवाह करेगा।
कुमार कार्तिकेय पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए चल पड़े, जबकि गणेश जी ने माता-पिता की पूजा कर सात बार प्रदिक्षणा की।
शास्त्र वचन की विजयगणेश जी ने वेद-शास्त्र का वचन सुनाया।
माता-पिता ही संपूर्ण पृथ्वी के समान हैं।
उनकी सेवा से पृथ्वी परिक्रमा का फल प्राप्त होता है।
शिव-पार्वती ने इस सत्य को स्वीकार किया।
गणेश जी को विजयी घोषित किया गया।
विवाह का शुभारंभ हुआ।
भगवान शिव और माता पार्वती ने गणेश जी को सर्वप्रथम विवाह के लिए योग्य मान लिया।
🌺 गणेश जी का विवाह
प्रजापति विश्व रूप की दो कन्याएं सिद्धि और बुद्धि थीं।
भगवान शिव और माता पार्वती की इच्छा अनुसार गणेश जी का विवाह दोनों कन्याओं से संपन्न हुआ।
विश्वकर्मा ने विवाह कार्यक्रम को पूरी भव्यता से संपन्न किया।
गणेश जी के दोनों पत्नियों से दो दिव्य पुत्र उत्पन्न हुए: सिद्धि से क्षेम और बुद्धि से लाभ।
✨ कुमार कार्तिकेय का वैराग्य
कुमार कार्तिकेय जब पृथ्वी की परिक्रमा कर लौटे, तब देवर्षि नारद जी से गणेश जी के विवाह का वृत्तांत मिलाा, तब माता-पिता के रोकने पर भी नहीं रुके, एवं रुष्ट होकर क्रौंच पर्वत की ओर चले गए।
ब्राह्मा जी के अनुसार, इस घटनाक्रम के पश्चात शिव पुत्र स्वामी कार्तिकेय का कुंवारापन प्रसिद्ध हुआ।
त्रिलोक में उनका नाम विख्यात हुआ और वे मनुष्य के पाप नाशक बने।
कार्तिक पूर्णिमा के दिन उनके दर्शन से संपूर्ण पाप नष्ट होते हैं और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
भगवान शिव ने अपने एक अंश से मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग में विराजमान होकर उन्हें देखा।
🌙 मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की महिमा
मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग में भगवान शिव और माता पार्वती आज भी विराजमान हैं।
माता पार्वती कुमार के चले जाने के बाद बहुत उदास रहने लगी उन्होंने देवाधिदेव महादेव से बार- बार कुमार को देखने जाने के लिए कहा तब करूणानिधि भगवान शिव अपने एक अंश के साथ उस क्रौंच पर्वत पर विराजमान हो गए।यह स्थल भक्तों के पाप नाश और मनोकामनाओं की पूर्ति का केंद्र है।
भगवान शिव अमावस्या को और माता पार्वती पूर्णिमा को विशेष रूप से प्रकट होते हैं।
यह लीला सभी भक्तों के लिए श्रद्धा और भक्ति का मार्ग दर्शाती है।
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