Shiv pujaभगवान शिव की भागीरथ पर कृपा
प्रस्तावना
प्राचीन भारतीय संस्कृति में गंगा अवतरण की कथा अत्यंत पवित्र और प्रेरणादायी है। यह कथा केवल नदी की उत्पत्ति की नहीं, बल्कि तपस्या, धैर्य और लोककल्याण के लिए किए गए त्याग की है।
राजा सगर और उनके वंशज
सूर्यवंशी राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। उनके यज्ञ का घोड़ा इन्द्र द्वारा छिपा दिया गया, जिसे खोजते हुए सगरपुत्र कपिल मुनि के आश्रम पहुँचे। वहां अशुद्ध दृष्टि से घोड़े को देखने पर कपिल मुनि के क्रोध से 60,000 सगरपुत्र भस्म हो गए।
अंशुमान और दिलीप
राजा सगर के पौत्र अंशुमान और फिर दिलीप ने पितरों की मुक्ति के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाने का प्रयास किया, किंतु सफल न हो सके।
राजा भगीरथ की तपस्या
राजा भगीरथ ने कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा अवतरित होने को तैयार हुईं, किंतु उनके तीव्र वेग को संभालने के लिए भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण किया और धीरे-धीरे उन्हें पृथ्वी पर छोड़ा।
गंगा अवतरण और पितरों की मुक्ति
गंगा के पृथ्वी पर आगमन से न केवल सगरपुत्रों की आत्मा को शांति मिली, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए गंगा मोक्षदायिनी बन गईं। तभी से गंगा को "भगीरथ प्रयत्न" का प्रतीक माना जाता है।

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