शिव खेले मसाने में होली : जीवन, मृत्यु और मोक्ष का शाश्वत सत्य
शिव खेले मसाने में होली :
एक सामाजिक और
आध्यात्मिक अवधारणा
शिव खेले मसाने में होली।
लेकर भूतों-प्रेतों की टोली।।
भगवान शिव का व्यक्तित्व अद्भुत है। वे केवल देवों के देव महादेव ही नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु दोनों के साक्षी हैं। वे श्मशान में भी विराजते हैं और कैलाश पर भी। वे भूतों, प्रेतों, पशुओं, मनुष्यों और समस्त सृष्टि के स्वामी हैं। यही कारण है कि शिव को "भूतभावन" कहा गया है।
मनुष्य अपने जीवन में सामाजिक संबंधों, धन, प्रतिष्ठा और भौतिक सुखों में इतना व्यस्त हो जाता है कि वह अपने अस्तित्व के मूल सत्य को भूल जाता है। वह स्वयं को परिवार, समाज और संपत्ति तक सीमित समझने लगता है, जबकि संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार शिवतत्त्व है।
मनुष्य और सामाजिक संरचना
मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा जाता है। वह जन्म से लेकर मृत्यु तक अनेक संबंधों का निर्वहन करता है—पिता, पुत्र, भाई, पति, मित्र और नागरिक के रूप में। परंतु अक्सर वह इन संबंधों को ही अंतिम सत्य मान बैठता है।
वास्तविकता यह है कि अधिकांश संबंध परिस्थितियों और स्वार्थों पर आधारित होते हैं। जब तक व्यक्ति सक्षम, स्वस्थ और उपयोगी है, तब तक समाज उसके साथ खड़ा दिखाई देता है। किंतु विपत्ति, बीमारी या मृत्यु के समय वही संबंध अपनी सीमाएँ प्रकट कर देते हैं।
श्मशान का सत्य
मनुष्य जीवन भर धन और संपत्ति अर्जित करने में लगा रहता है। वह घर बनाता है, परिवार बसाता है और सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। परंतु जब उसका अंतिम समय आता है, तब वही व्यक्ति खुले आकाश के नीचे श्मशान की भूमि पर पहुंच जाता है।
जिस माता ने जन्म दिया, जिस पत्नी ने जीवन भर साथ निभाया, वे भी एक सीमा तक ही साथ जाती हैं। पुत्र, भाई और मित्र श्मशान तक पहुंचते हैं, किंतु अंततः शरीर अग्नि को समर्पित कर लौट आते हैं।
श्मशान मनुष्य को यह स्मरण कराता है कि संसार का प्रत्येक भौतिक साधन अस्थायी है। जो आज हमारा है, वह कल किसी और का हो जाएगा।
शिव और मोक्ष का मार्ग
महाकाल की भस्म आरती, श्मशान की राख और शिव का वैराग्य हमें जीवन का गहन संदेश देते हैं। शिव हमें सिखाते हैं कि संसार में रहते हुए भी उसके मोह में बंधना आवश्यक नहीं है।
यदि मनुष्य प्रतिदिन कुछ समय शिव स्मरण, शिव आराधना और आत्मचिंतन को दे, तो वह जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझ सकता है। दया, क्षमा, करुणा, दान और सत्य का पालन करते हुए वह अपने सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन भी कर सकता है और आध्यात्मिक उन्नति भी प्राप्त कर सकता है।
निष्कर्ष
शिव केवल एक देवता नहीं, बल्कि जीवन के अंतिम सत्य के प्रतीक हैं। वे हमें स्मरण कराते हैं कि धन, पद और प्रतिष्ठा क्षणभंगुर हैं, जबकि आत्मा और शिवतत्त्व शाश्वत हैं।
अतः प्रत्येक मनुष्य को सामाजिक उत्तरदायित्वों का पालन करते हुए शिव स्मरण, शिव चिंतन और आत्मकल्याण के मार्ग पर चलना चाहिए।
ॐ श्री शिवाय नमस्तुभ्यं।
शिवं सत्यं, शिवं सुंदरम्।

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