हृदय-कमल में शिव का ध्यान — लिंग पुराण में वर्णित योग-साधना

हृदय-कमल में शिव का ध्यान — लिंग पुराण की योग-साधना

हिमालय में ध्यानस्थ योगी और हृदय-कमल में प्रकाशित शिव-तत्त्व का आध्यात्मिक दृश्य


हृदय-कमल में शिव का ध्यान — लिंग पुराण में वर्णित योग-साधना

मनुष्य जब बाहरी संसार से अपनी दृष्टि हटाकर अपने भीतर की ओर यात्रा प्रारंभ करता है, तब योग केवल शरीर को साधने की प्रक्रिया नहीं रह जाता। वह धीरे-धीरे मन, गुणों और अंततः स्वयं की वास्तविक सत्ता को जानने का मार्ग बन जाता है।

लिंग पुराण के आठवें अध्याय में योगी के लिए आसन, इंद्रिय-संयम, ध्यान और शिव-तत्त्व के चिंतन की एक गहन साधना का वर्णन मिलता है। साधक को क्रमशः चित्त को एकाग्र करते हुए हृदय-कमल में परम शिव का ध्यान करने की दिशा दिखाई गई है।

दृढ़ आसन और अंतर्मुखी दृष्टि

बुद्धिमान योगी को इस प्रकार दोनों जानू बराबर करके अथवा एक जानू में स्थित होकर वृषण तथा लिंग को दोनों एड़ियों के बीच करके दृढ़ आसन लगाकर, मुख को बंद करके, सिर को कुछ ऊँचा उठाकर दाँतों का परस्पर स्पर्श बनाए रखना चाहिए।

सभी ओर से दृष्टि को रोककर उन्मीलित नेत्रों से अपने नासिकाग्र पर दृष्टि केंद्रित करनी चाहिए तथा वक्षस्थल को आगे की ओर उन्नत रखना चाहिए।

योगी को तमोगुण को रजोगुण से तथा रजोगुण को सत्त्वगुण से आच्छादित करना चाहिए। इस प्रकार केवल सत्त्वगुण में स्थित होकर शिव-ज्ञान का अभ्यास करना चाहिए।

यहाँ साधना का उद्देश्य केवल शरीर को किसी विशेष मुद्रा में रखना नहीं है। शरीर की स्थिरता के माध्यम से साधक धीरे-धीरे अपनी इंद्रियों और चित्त को अंतर्मुखी करता है।

हृदय-कमल में परमात्मा का ध्यान

समाहित चित्त होकर साधक को परम शुद्ध, दीपशिखा की आकृति वाली तथा ॐकार नाम से अभिहित उस परमात्मा का अपने हृदय-कमल की कर्णिका में ध्यान करना चाहिए।

अथवा विद्वान साधक को नाभि से तीन अंगुल नीचे अष्टकोणात्मक, पंचकोणात्मक अथवा त्रिकोणात्मक उत्तम कमल का ध्यान करना चाहिए।

उसमें क्रमानुसार अपनी शक्तियों सहित अग्नि-मंडल, चंद्र-मंडल और सूर्य-मंडल अथवा सूर्य-चंद्र-अग्नि मंडल अथवा अग्नि-सूर्य-चंद्र मंडल का विधिवत ध्यान करना चाहिए।

अग्नि के नीचे धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य—इस चतुष्टय की कल्पना करते हुए मंडलों के ऊपर सत्त्व, रज तथा तम की भावना करनी चाहिए और पार्वती से सुशोभित सत्त्वस्थित रुद्र का चिंतन करना चाहिए।

शरीर के विभिन्न केंद्रों में शिव-ध्यान

इसी प्रकार नाभि, कंठ, भ्रूमध्य, ललाट-पट्ट अथवा मस्तक में विधि के अनुसार शिव का ध्यान करना चाहिए।

क्रमानुसार द्विदल, षोडशदल, द्वंद्व, षड्दल अथवा चतुर्दल कमल में शंकर जी का ध्यान करना चाहिए।

इस प्रकार साधक अपने शरीर के विभिन्न केंद्रों को ध्यान का आधार बनाकर धीरे-धीरे अपने चित्त को ऊर्ध्व दिशा में ले जाता है।

शिव के दिव्य स्वरूप का ध्यान

स्वर्ण की आभा वाले, अंगार के सदृश्य, महाश्वेत, द्वादश सूर्य के समान दीप्त, चंद्रबिंब के सदृश्य तथा करोड़ों विद्युत के समान प्रभा वाले, अग्निवर्ण के सदृश्य और करोड़ों विद्युत वलयों के तुल्य आभा वाले उन-उन स्थानों में साधक को समाहित चित्त होकर परमेश्वर का चिंतन करना चाहिए।

करोड़ों वज्रों की प्रभा वाले अथवा पद्मराग के सदृश्य अथवा नीललोहित बिंब (सूर्य-बिंब) के तुल्य स्थान में योगी को शिव का ध्यान करना चाहिए।

इन विभिन्न उपमाओं के माध्यम से शिव के दिव्य प्रकाश और परम चेतना की अनुभूति का संकेत किया गया है।

शरीर के विभिन्न स्थानों में शिव के विविध स्वरूप

हृदय-प्रदेश में महेश्वर का, नाभि-कमल में सदाशिव का, ललाट में चंद्रचूड़ का, भ्रूमध्य में साक्षात् शंकर का तथा दिव्य शाश्वत स्थान मूर्धा में शिव का ध्यान करना चाहिए।

इस प्रकार साधक का ध्यान केवल बाहरी रूप तक सीमित नहीं रहता। वह अपने भीतर स्थित विभिन्न आध्यात्मिक केंद्रों में शिव-तत्त्व का चिंतन करता हुआ अंततः परम शिव की ओर अग्रसर होता है।

शिव का निर्गुण और परम स्वरूप

वे शिव निर्मल हैं।

वे कला अथवा अवयव से रहित हैं।

वे ब्रह्मरूप हैं।

वे शांत हैं।

वे ज्ञानस्वरूप हैं।

वे लक्षणों से रहित एवं अनिर्देश्य हैं।

वे अणु से भी सूक्ष्म हैं।

वे कल्याणकारी हैं।

वे आश्रय रहित हैं।

वे तर्कों से परे हैं।

वे उत्पत्ति और विनाश से रहित हैं।

वे मोक्षस्वरूप हैं।

वे परम गति हैं।

वे कल्याणरूप हैं।

वे उपमारहित हैं।

वे अमृतस्वरूप हैं।

वे अविनाशी हैं।

वे पुनर्भवरहित ब्रह्मस्वरूप हैं।

शिव — महानंद और परमानंद

वे अद्भुत हैं।

वे महानंद हैं।

वे परानंद हैं।

वे योगानंद हैं।

वे व्याधिरहित हैं।

वे त्याग तथा ग्रहण से रहित हैं।

वे सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर हैं।

वे कल्याणमय हैं।

वे स्वयंवेद्य अथवा अवेद्य हैं।

वे परम ज्ञानयुक्त हैं।

वे इंद्रियों की पहुँच से परे हैं।

वे आभास से परे हैं।

वे परम तत्त्व हैं।

वे परात्पर हैं।

वे सभी उपाधियों से मुक्त हैं।

इस स्वरूप में शिव किसी सीमित रूप, नाम या गुण में बंधे हुए नहीं हैं। वे उस परम तत्त्व का संकेत हैं जो सभी सीमाओं से परे है।

हृदय-कमल में महादेव का ध्यान

विचारणापूर्वक ध्यान करने से प्राप्त होने वाले, एकरूप तथा तम से भी बढ़कर परम रूप में स्थित ऐसे महादेव का हृदय-कमल में ध्यान करना चाहिए।

यह साधना हमें एक गहरी बात समझाती है—शिव को जानने की यात्रा अंततः भीतर की ओर जाने वाली यात्रा है।

जब मन चंचल है, तब ध्यान कठिन है।

जब मन गुणों से बँधा है, तब परम शिव के निर्गुण स्वरूप को समझना कठिन है।

और जब मन शुद्ध होकर समाहित होता है, तब साधक अपने भीतर उस परम चेतना की ओर बढ़ता है, जिसे योग परंपरा ने शिव कहा है।

निष्कर्ष

शिव-ध्यान का यह मार्ग केवल आँखें बंद करके किसी रूप की कल्पना करना नहीं है।

यह दृढ़ आसन से प्रारंभ होकर दृष्टि और इंद्रियों को संयमित करने, चित्त को एकाग्र करने, तम से रज और रज से सत्त्व की ओर उठने तथा अंततः परम शिव-तत्त्व की ओर जाने की साधना है।

हृदय-कमल में शिव का ध्यान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि साधक की अंतिम यात्रा बाहर से भीतर की ओर है।

जिस शिव को मनुष्य पर्वतों, मंदिरों और तीर्थों में खोजता है, उसी शिव-तत्त्व की अनुभूति के लिए अंततः उसे अपने भीतर उतरना पड़ता है।

शिव बाहर भी हैं, लेकिन शिव की अनुभूति के लिए भीतर उतरना पड़ता है।

प्रश्न–उत्तर

प्रश्न 1: लिंग पुराण के इस अध्याय में मुख्य रूप से किस विषय का वर्णन किया गया है?

उत्तर: इस अध्याय में योगी के लिए आसन, इंद्रिय-संयम, ध्यान और शिव-तत्त्व के चिंतन की साधना का वर्णन मिलता है। साधक को क्रमशः चित्त को एकाग्र करके हृदय-कमल में परम शिव का ध्यान करने की दिशा दिखाई गई है।

प्रश्न 2: शिव का ध्यान हृदय-कमल में करने का क्या महत्व है?

उत्तर: हृदय-कमल को साधक के अंतर्मुखी ध्यान का महत्वपूर्ण केंद्र बताया गया है। यहाँ परम शुद्ध, दीपशिखा के समान प्रकाशित परमात्मा और ॐकार का ध्यान करने की बात कही गई है।

प्रश्न 3: तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण के बारे में क्या बताया गया है?

उत्तर: साधक को तमोगुण को रजोगुण से तथा रजोगुण को सत्त्वगुण से आच्छादित करते हुए सत्त्व की निर्मल अवस्था में स्थित होकर शिव-ज्ञान का अभ्यास करने के लिए कहा गया है।

प्रश्न 4: क्या शिव का ध्यान केवल हृदय में ही करने का वर्णन है?

उत्तर: नहीं। नाभि, कंठ, भ्रूमध्य, ललाट और मस्तक आदि विभिन्न स्थानों में भी विधि के अनुसार शिव-ध्यान का वर्णन मिलता है।

प्रश्न 5: इस वर्णन में शिव के स्वरूप को किस प्रकार बताया गया है?

उत्तर: शिव को निर्मल, शांत, ज्ञानस्वरूप, अणु से भी सूक्ष्म, तर्क से परे, मोक्षस्वरूप, अमृतस्वरूप, अविनाशी, परम तत्त्व और सभी उपाधियों से मुक्त बताया गया है।

प्रश्न 6: शिव को परमानंद और योगानंद क्यों कहा गया है?

उत्तर: क्योंकि यहाँ शिव को किसी सीमित भौतिक रूप तक सीमित नहीं किया गया है। वे परम चेतना और आनंद के उस स्वरूप के रूप में वर्णित हैं जो इंद्रियों और सामान्य तर्क की सीमाओं से परे है।

प्रश्न 7: क्या इस लेख में वर्णित योग-साधनाओं का अभ्यास स्वयं किया जा सकता है?

उत्तर: नहीं। लेख का उद्देश्य इन साधनाओं का अभ्यास करवाना नहीं, बल्कि लिंग पुराण में वर्णित प्राचीन योग एवं शिव-ध्यान परंपरा की जानकारी देना है। विशेषकर आसन, प्राणायाम और कुंभक जैसी साधनाओं का अभ्यास योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही किया जाना चाहिए।

प्रश्न 8: गुरु के मार्गदर्शन के बिना अभ्यास करने में क्या समस्या हो सकती है?

उत्तर: योग-साधना की विधि में शरीर, श्वास और चित्त का सूक्ष्म संयम शामिल होता है। गलत तरीके से अभ्यास करने पर शारीरिक कठिनाई उत्पन्न हो सकती है। इसलिए बिना उचित मार्गदर्शन के ऐसे अभ्यास से बचना चाहिए।

प्रश्न 9: इस लेख का मुख्य उद्देश्य क्या है?

उत्तर: इस लेख का मुख्य उद्देश्य लिंग पुराण के आठवें अध्याय में वर्णित शिव-ध्यान और योग-साधना के विषय से पाठकों को परिचित कराना है, न कि उन्हें स्वयं योग-अभ्यास करने का निर्देश देना।

प्रश्न 10: इस पूरे शिव-ध्यान का सबसे गहरा संदेश क्या समझा जा सकता है?

उत्तर: इसका एक गहरा संदेश यह है कि साधक की आध्यात्मिक यात्रा धीरे-धीरे बाहरी संसार से भीतर की ओर जाती है। चित्त के शांत और समाहित होने पर साधक अपने भीतर स्थित परम शिव-तत्त्व की ओर उन्मुख होता है।

पाठकीय सूचना

इस लेख में वर्णित योग एवं ध्यान-साधना का विवरण लिंग पुराण के आठवें अध्याय में वर्णित विषय के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। इसका उद्देश्य केवल पाठकों को लिंग पुराण में वर्णित प्राचीन योग एवं शिव-ध्यान परंपरा की जानकारी देना है।

यह लेख किसी व्यक्ति को इन साधनाओं का स्वयं अभ्यास करने के लिए निर्देश या प्रेरणा देने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है। विशेष रूप से आसन, प्राणायाम, कुंभक अथवा अन्य योग-साधनाओं का अभ्यास योग्य गुरु के मार्गदर्शन के बिना नहीं करना चाहिए, क्योंकि गलत विधि से अभ्यास करने पर शारीरिक कठिनाई उत्पन्न हो सकती है।

लेख का उद्देश्य केवल लिंग पुराण में वर्णित विषय की जानकारी देना है।

एक और आध्यात्मिक यात्रा

शिव-ध्यान की इस अंतर्मुखी यात्रा के बाद यदि आप यह समझना चाहते हैं कि क्या मनुष्य अपने जीवन को शांति और प्रेम के साथ भी जी सकता है, तो हमारा यह लेख भी पढ़ें।

क्या जीवन को शांति और प्रेम के साथ भी जिया जा सकता है?”

यह लेख जीवन में शांति, प्रेम और आंतरिक चेतना के महत्व को एक सरल मानवीय दृष्टि से समझने का प्रयास  है। 

हर हर महादेव

 

 

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