विश्वव्यापी भगवान शिव: दया, भक्ति और पंचतत्व पूजा की महिमा

विश्वव्यापी भगवान शिव

विश्वव्यापी भगवान शिव

शिव की दया :-

परम दयालु प्रभु भगवान शिव, दया के सागर हैं। हनुमान जी से युद्ध करते समय केवल हनुमान जी की कीर्ति को सारी दुनिया में फैलाने के लिए — अपने भक्त को वंदनीय बनाने हेतु भगवान शिव अपने ही भक्त से हार गए।

जब राजा शिवमणि ने कहा — "प्रभु, आपने मुझे युद्ध न रोकने का वचन दिया था, और भगवान श्रीराम की उपस्थिति देखकर आपने युद्ध विराम कर दिया!" — तब भगवान शिव बोले — "हे राजन, आप राम, हनुमान और मेरे अंदर देखकर बताएं, यहाँ राम कहाँ हैं? हनुमान कहाँ हैं?"

राजा शिवमणि ने भक्ति भाव से देखा तो उन्हें राम और हनुमान — दोनों में शिव का ही स्वरूप दिखाई दिया। अर्थात भगवान शिव सर्वव्यापक हैं।

ऐसा ही एक प्रश्न और आता है —

जब अहिरावण राम और लक्ष्मण जी को पाताल लोक ले गया, तो हनुमान जी ने जाना कि अहिरावण की मृत्यु बिना भगवान शिव की पंचतत्व पूजा के संभव नहीं। वे चिंतित हुए कि शिवलिंग कहाँ से लाऊँ? समय बहुत कम था, अहिरावण किसी भी क्षण आ सकता था।

हनुमानजी की दुविधा :-

हनुमान जी ने विचार किया — “भगवान शिव तो सृष्टि के कण-कण में हैं।” और तत्क्षण उन्होंने वहीं पत्थर से शिवलिंग का निर्माण किया, पाँच तत्वों — अग्नि, वरुण, पृथ्वी, आकाश, वायु — से भगवान शिव की विधिवत पूजा की और अहिरावण को पराजित किया।

श्री शंकराचार्य जी ने तैत्तिरीय उपनिषद् की व्याख्या में कहा — “उमा” शब्द का अर्थ ब्रह्मविद्या है। शिव-पार्वती का रूप ज्ञान का प्रतीक है। परमात्मा ने अपने को स्त्री और पुरुष दो रूपों में प्रकट किया — माता-पिता के रूप में।

पाणिनीय अष्टाध्यायी की रचना :-

पाणिनि की अष्टाध्यायी में चौदह सूत्रों से व्याकरण शास्त्र की रचना हुई। इसमें कहा गया — मनुष्य की सारी गतिविधियों की डोरी किसी अदृश्य शक्ति के हाथों में रहती है।

भगवान शिव निर्गुण भी हैं और माया से परे भी। उनका कोई आकार नहीं — वे पूर्ण रूप से निराकार हैं। फिर भी सारे विश्व का वही आधार हैं। उनकी अनंत विभूतियों से ही यह संसार प्रकट है।

उन्हें जानने के लिए सबसे पहले जीव को उस परमेश्वर की शरण में जाना चाहिए। तब उसे उमा हेमवती — अर्थात ब्रह्मविद्या की सहायता प्राप्त होती है। योगियों की समाधि का लक्ष्य भी यही है — कि मूलाधार में सोई कुंडलिनी, ब्रह्मरंध्र में जाकर शिव से मिल जाए।

ब्रह्म तब प्रकट होता है जब देवताओं ने असुरों पर विजय प्राप्त की — अर्थात जब आसुरी प्रवृत्तियाँ हारती हैं, तभी शिव स्वरूप का साक्षात्कार होता है।

पहले हमें अपने अंदर की आसुरी प्रवृत्तियाँ — काम, क्रोध, माया, लोभ, मद — पर विजय प्राप्त करनी होगी। चित्त को शांत कर मन को ईश्वर में लगाना होगा। तभी ज्ञान, सुख और मन की शांति प्राप्त होगी।

शिव के बिना शक्ति नहीं और बिना शक्ति के शिव नहीं। शिव और शक्ति में कोई भेद नहीं। इसी प्रकार शिव और विष्णु भी एक ही तत्त्व हैं, केवल रूप और वेश में भिन्न प्रतीत होते हैं।

जैसे सारी नदियाँ अंततः समुद्र में मिल जाती हैं, वैसे ही सभी विरोधाभास और उपाय अंततः शिव में जाकर विलीन हो जाते हैं।

ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय हर॥
अस्वीकरण (Disclaimer):
इस लेख में व्यक्त विचार पूर्णतः आध्यात्मिक और पौराणिक दृष्टिकोण से लिखे गए हैं। इसका उद्देश्य केवल पाठकों में भगवान शिव के प्रति श्रद्धा, ज्ञान और भक्ति की भावना को जागृत करना है। यह किसी धार्मिक संस्था, परंपरा या वैज्ञानिक तथ्य से विवादित व्याख्या प्रस्तुत नहीं करता। इस लेख की सामग्री पर किसी प्रकार का अंधविश्वास या अंधानुकरण करना लेखक का अभिप्राय नहीं है। पाठक अपने विवेक और श्रद्धा से इसका अध्ययन करें। लेख में वर्णित जानकारी के लिए ब्लॉग या लेखक किसी प्रकार से जिम्मेदार नहीं होंगे।

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