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एक शिव भक्त की मनोभाव का दर्शन “श्री शिवाय नमस्तुभ्यं : शिव प्रेम, करुणा और निष्काम भक्ति का पथ”
मिश्रा जी की शिव भक्ति : “श्री शिवाय नमस्तुभ्यं” मंत्र का वैश्विक संदेश प्रस्तावना मैं त्रयंबकम नाथ मिश्रा, भगवान महादेव की भक्ति में लीन होकर समस्त विश्व में “श्री शिवाय नमस्तुभ्यं” मंत्र का प्रचार-प्रसार करना चाहता हूँ। मेरी भावना है कि सम्पूर्ण मानव समाज में शिवतत्व का जागरण हो और प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में करुणा, प्रेम, शांति तथा पवित्रता का प्रकाश उत्पन्न हो। मेरे अंतर्मन में यह भाव सदैव जागृत रहता है कि संसार की समस्त नारी जाति उम्र के अनुसार मेरी माता, बहन और पुत्री के स्वरूप में दिखाई दे। भारतीय सनातन संस्कृति का यह महान सिद्धांत— “मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्ठवत्। आत्मवत् सर्वभूतेषु, यः पश्यति सः पण्डितः॥” मनुष्य को दिव्यता की ओर ले जाने वाला मार्ग है। इसी भावना से मैं समस्त प्राणी जगत की सेवा भगवान शिव का कृपा-पात्र बनकर करना चाहता हूँ। शिव : करुणा और कृपा के सागर भगवान शिव अत्यंत दयालु, करुणामय और भक्तवत्सल हैं। वे केवल देवताओं के देव ही नहीं, बल्कि दुखियों के सहारा, पतितों के उद्धारक और भक्तों के जीवन में आशा का दीपक हैं। जब कोई भक्त इस भावना से शिव...
वसुधैव कुटुम्बकम् : युद्ध नहीं, विश्व कल्याण की ओर
मनुष्य ने विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अद्भुत प्रगति की है। आज हम अंतरिक्ष तक पहुँच चुके हैं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का निर्माण कर चुके हैं और संसार को एक वैश्विक परिवार के रूप में जोड़ने की क्षमता रखते हैं। परंतु एक प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है—क्या हमारी नैतिक चेतना भी उतनी ही विकसित हुई है जितनी हमारी तकनीक? भारतीय दर्शन में एक गूढ़ वाक्य आता है—"एकोऽहम् बहुस्यामि" अर्थात् "मैं एक हूँ, अनेक हो जाऊँ।" सृष्टि की रचना का यही मूल भाव है। परमात्मा ने इस विराट जगत की रचना केवल भौतिक अस्तित्व के लिए नहीं, बल्कि प्रेम, सहयोग, करुणा और सह-अस्तित्व के लिए की। प्रकृति की ओर दृष्टि डालिए। पर्वत, नदियाँ, वन, पशु-पक्षी और समस्त जीव-जगत एक अद्भुत संतुलन में कार्य करते हैं। परंतु मनुष्य ने अपने अहंकार और स्वार्थ के कारण इस संतुलन को चुनौती दी। परिणाम हमारे सामने हैं—ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण, जल संकट, अत्यधिक तापमान, जंगलों का विनाश और प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती घटनाएँ। जब मनुष्य प्रकृति से दूर होता है, तब वह स्वयं से भी दूर हो जाता है। शांति केवल युद्ध का अभाव नहीं है। शांत...
शिव और शक्ति का रहस्य | अर्धनारीश्वर का आध्यात्मिक अर्थ | Shiv Shakti Philosophy
शिव बिना शक्ति और शक्ति बिना शिव अधूरे क्यों हैं? सनातन परंपरा में भगवान शिव और माता पार्वती का संबंध केवल पति-पत्नी का संबंध नहीं माना गया है। यह संबंध एक गहन आध्यात्मिक सत्य का प्रतीक है। इसी सत्य को समझाने के लिए हमारे शास्त्रों ने अर्धनारीश्वर की अद्भुत कल्पना प्रस्तुत की है। शिव को चेतना कहा गया है और शक्ति को सृष्टि की क्रियाशील ऊर्जा। चेतना बिना ऊर्जा के कुछ कर नहीं सकती और ऊर्जा बिना चेतना के दिशाहीन हो जाती है। इसलिए कहा गया है कि शिव और शक्ति का मिलन ही सृष्टि का आधार है। भगवान शिव समाधिस्थ योगी हैं। वे वैराग्य, ज्ञान और मौन के प्रतीक हैं। दूसरी ओर माता पार्वती प्रेम, करुणा, सेवा, सृजन और शक्ति की प्रतीक हैं। यदि केवल वैराग्य हो और करुणा न हो, तो जीवन कठोर बन सकता है। यदि केवल भावना हो और विवेक न हो, तो जीवन दिशाहीन हो सकता है। शिव और शक्ति का मिलन इन दोनों के संतुलन का संदेश देता है। माता पार्वती ने भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की। यह केवल विवाह की कथा नहीं है। यह उस साधक की कथा है जो सत्य को प्राप्त करने के लिए धैर्यपूर्वक प्रयास करता है। शि...
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