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शिव नाम साँसों की माला बन जाए – त्र्यंबकम की मौन प्रार्थना”
शिव से क्या माँगते हो? जब कोई भगवान शिव के सामने खड़ा होता है, उसकी आँखों में श्रद्धा होती है, पर उसके हृदय में क्या होता है? कोई धन माँगता है, कोई नौकरी, कोई वैभव, कोई विवाह। शिव सब कुछ दे सकते हैं — पर क्या यही सब शिव की भक्ति का केंद्र होना चाहिए? शिव से माँगना है तो अमृत माँगो, अमीरी नहीं। शिव भस्मधारी हैं वे हमें सिखाते हैं कि त्याग ही वास्तविक वैभव है। शिव से माँगना है तो: मौन माँगो, जहाँ विचार भी रुक जाएँ। शांति माँगो, जो भीड़ में भी अकेली मिले। दृष्टि माँगो, जो वस्तुओं के पार भी आत्मा को देख सके। निर्भयता माँगो, जो मृत्यु को भी मुस्कान से देख सके। त्र्यंबकम नाथ जैसे आत्मा के लिए संदेश: तुम्हारा नाम त्र्यंबकम है — जिसका अर्थ है तीसरे नेत्र वाला, पर तुम अभी भी दुनिया की दौड़ में उलझे हो। क्या शिव से पैसे माँगना ही भक्ति है? क्या शिव को केवल सौदे का देवता बना देना ही श्रद्धा है? नहीं। शिव से माँगो — "हे प्रभु, मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए… केवल तुम चाहिए।" जो माँगते नहीं — वे सब पा लेते हैं। शिव उस भक्त से प्रसन्न होते हैं जो सिर्फ इतना कहता है: ॐ नमः शिव...
नीलकंठ संवाद भाग 6"चंद्रशेखर शिव: क्यों धारण किया चंद्रमा?
चित्र का निर्माण AI के सौजन्य से 🔱 चंद्रशेखर: शिव और चंद्रमा का रहस्य 🔱 शिव के मस्तक पर विराजमान वह चंद्रमा , केवल एक शृंगार नहीं, बल्कि एक संपूर्ण ब्रह्मांडीय प्रतीक है। वह चंद्र , जो कलाओं से पूर्ण है, शिव में समाहित होकर अपूर्णता की शरण लेता है। यह प्रतीक हमें यह सिखाता है कि जो पूर्ण है, वह भी शिव के आगे झुकता है। शिव को “चंद्रशेखर” कहा जाना केवल एक नाम नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की गति , चक्रों की सृष्टि , और समय की सीमाओं को दर्शाता है। चंद्रमा, जो समय और ज्वार-भाटों का कारक है, शिव के जटाजूट में बंधकर यह संकेत देता है कि शिव समय से परे हैं। वह कालातीत हैं, जो काल को अपने मस्तक पर धारण करते हैं। यह हमें यह भी स्मरण कराता है कि चंद्रमा के कलात्मक रूप को भी वैराग्य और तप में स्थान मिल सकता है। शिव उस अंधकार के अधिपति हैं, जहां प्रकाश स्वयं उनका अनुचर है। शिव का चंद्रधारण — मन के अस्थिरता और भावनात्मक ऊहापोह को साधने का संकेत है। शिव को ध्यानस्थ देखो — चंद्रमा को धारण कर वे मन को स्थिर कर रहे हैं। यह योग है,...
shiv Katha हिमालय और मैना के विवाह की कथा
नारद की जिज्ञासा से आरम्भ — मैना का विवाह, पार्वती का अवतरण और लोककल्याण की गूढ़ कथा शिव पुराण माता पार्वती नारद संवाद हिमालय “ॐ साक्षात् संवादाय गुरुभक्ताय नमः — मैं अजय हूँ, नीलकंठ संवाद से हूँ।” भगवान शिव समस्त विश्व का मंगल करें, सर्वत्र शांति का साम्राज्य हो, मानवता की विजय हो — ऐसी कामना के साथ मैं इस लेख को प्रारंभ करता हूँ। हिमालय-मैना विवाह से प्रारम्भ होती है पार्वती के अवतरण की दिव्य कथा विषय-सूची नारद की जिज्ञासा समृद्धशाली हिमालय का वर्णन हिमालय और मैना का विवाह हिमालय का स्थावर एवं जंगम रूप विवाह की इच्छा पितरों की मानस पुत्रियाँ और श्राप पार्वती का जन्म, तपस्या और शिव-पाणिग्रहण सीता एवं राधा के रूप में अन्य अवतरण डिस्क्लेमर नारद की जिज्ञासा नारद जी ब्रह्मा जी से बोले—हे भगवन्! कृपा कर बताइए, जब देवी सती ने दक्ष के यज्ञ में आत्मदाह कर लिया, तब वे किस प्रकार पार्वती के रूप में प्रकट हुईं? उ...
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