सच कम भी हो लेकिन अच्छा लगता है, झूठ का पुलिंदा बाँधने से
लेकिन सत्य की एक विशेषता है।
उसे सजाने की आवश्यकता नहीं होती।
वह छोटा हो सकता है, अपूर्ण हो सकता है, हमारे ज्ञान की सीमा के कारण अधूरा भी हो सकता है, लेकिन फिर भी वह सम्मान के योग्य होता है।
इसके विपरीत झूठ को हमेशा सहारे की आवश्यकता पड़ती है। एक झूठ को छिपाने के लिए दूसरा झूठ और दूसरे को छिपाने के लिए तीसरा झूठ बोलना पड़ता है। धीरे-धीरे मनुष्य सत्य से नहीं, अपनी बनाई हुई कहानी से बंध जाता है।
अध्यात्म की दृष्टि से देखें तो सत्य केवल बोलने की वस्तु नहीं है, बल्कि जीने की वस्तु है।
यदि किसी विषय का ज्ञान कम है, तो यह कहना कि:
"मुझे नहीं मालूम।"
यह भी सत्य है।
यदि किसी अनुभव को पूरी तरह नहीं समझा, तो यह कहना कि:
"मैं अभी खोज में हूँ।"
यह भी सत्य है।
लेकिन आज मनुष्य को सबसे अधिक कठिनाई इसी बात में होती है कि वह अपनी सीमाओं को स्वीकार नहीं करना चाहता।
सत्य विनम्र बनाता है।
झूठ अहंकार को पोषित करता है।
सत्य कहता है:
"मैं जितना जानता हूँ, उतना ही कहूँगा।"
झूठ कहता है:
"मैं सब जानता हूँ।"
यही कारण है कि इतिहास में जिन लोगों ने समाज को दिशा दी, उन्होंने स्वयं को सर्वज्ञ घोषित नहीं किया। उन्होंने खोज की, अनुभव किया, और जो समझा उसे ईमानदारी से साझा किया।
समाज को नई दिशा बड़े-बड़े दावों से नहीं मिलती।
समाज को दिशा मिलती है जब साधारण मनुष्य भी सत्य का सम्मान करना सीख लेता है।
क्योंकि अंततः विश्वास का आधार ज्ञान नहीं, सत्यनिष्ठा होती है।
एक व्यक्ति कम जानता हो, फिर भी विश्वसनीय हो सकता है।
लेकिन जो व्यक्ति असत्य का सहारा लेता है, उसका ज्ञान भी लोगों को आश्वस्त नहीं कर पाता।
इसलिए जीवन में यदि चुनाव करना पड़े, तो मैं यही कहूँगा—
सच कम हो तो भी चलेगा, लेकिन वह सच होना चाहिए।
झूठ का पुलिंदा अंततः स्वयं अपने भार से गिर जाता है।
और शायद यही कारण है कि सत्य का मार्ग कठिन होने पर भी मन को शांति देता है, जबकि असत्य का मार्ग आसान दिखकर भी भीतर अशांति छोड़ जाता है।
हर हर महादेव।

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