दीपक की लौ और मनुष्य का जीवन: क्या दोनों में कोई समानता है?

 


दीपक की लौ और मनुष्य का जीवन: क्या दोनों में कोई समानता है?

रात्रि के समय जलता हुआ एक छोटा-सा दीपक कई बार हमें जीवन के गहरे रहस्य का स्मरण करा देता है।


जब तक दीपक में तेल और बाती रहती है, तब तक उसकी लौ जलती रहती है। वह अपने थे प्रकाश फैलाती है। किन्तु एक समय ऐसा आता है जब लौ शांत हो जाती है और दीपक बुझ जाता है।


यह दृश्य देखकर मन में एक प्रश्न उठता है।

क्या मनुष्य का जीवन भी कुछ ऐसा ही है?

निश्चित रूप से दीपक और मनुष्य एक जैसे नहीं हैं। फिर भी एक उपमा के रूप में दोनों के बीच एक गहरी समानता दिखाई देती है।


मनुष्य का शरीर भी एक दिन जन्म लेता है, कुछ समय तक सक्रिय रहता है, अपने आसपास प्रभाव छोड़ता है और फिर एक दिन शांत हो जाता है।


हममें से कोई नहीं जानता कि जीवन का दीपक कितनी देर तक जलेगा।

यही अनिश्चितता जीवन को मूल्यवान बनाती है।


भारतीय चिंतन में मृत्यु को केवल अंत नहीं माना गया। उसे जीवन के एक स्वाभाविक चरण के रूप में भी देखा गया है।


भगवान शिव का स्वरूप इस संदर्भ में विशेष महत्व रखता है। शिव को संहार का देवता कहा जाता है, किन्तु उनका संहार विनाश नहीं बल्कि परिवर्तन का प्रतीक है।


दीपक की लौ बुझती है, पर अग्नि का तत्व समाप्त नहीं हो जाता।

ऋतुएँ बदलती हैं, पर प्रकृति का क्रम चलता रहता है।

इसी प्रकार शरीर नश्वर है, लेकिन जीवन का रहस्य केवल शरीर तक सीमित है या उससे आगे भी कुछ है — यह प्रश्न हजारों वर्षों से मनुष्य को आकर्षित करता रहा है।


शायद इसीलिए संतों ने बार-बार स्मरण कराया कि जीवन की लंबाई से अधिक महत्वपूर्ण उसके प्रकाश का होना है।

दीपक अपने लिए नहीं जलता।

वह दूसरों को प्रकाश देता है।

मनुष्य भी यदि अपने जीवन से प्रेम, ज्ञान, करुणा और सद्भाव का प्रकाश फैला सके, तो उसका जीवन सार्थक कहा जा सकता है।

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि दीपक कितनी देर जला।

प्रश्न यह है कि उसने अंधकार को कितना कम किया।

हर हर महादेव।

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह लेख आध्यात्मिक एवं दार्शनिक चिंतन के उद्देश्य से लिखा गया है। दीपक और मनुष्य के जीवन की तुलना एक प्रतीकात्मक उपमा के रूप में प्रस्तुत की गई है। इसका उद्देश्य किसी धार्मिक, वैज्ञानिक या चिकित्सकीय निष्कर्ष को स्थापित करना नहीं है।

लेख में व्यक्त विचार भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं, चिंतन और लेखक के व्यक्तिगत मनन पर आधारित हैं। पाठक अपने विवेक एवं समझ के अनुसार इसका अध्ययन करें।

हर हर महादेव।

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