लिंग पुराण के अनुसार प्राणायाम क्या है? प्राण और अपान का वास्तविक रहस्य

 

लिंग पुराण के अनुसार प्राणायाम केवल श्वास लेने और छोड़ने का अभ्यास नहीं, बल्कि प्राण और अपान वायु के संतुलन द्वारा मन, शरीर और चित्त को अनुशासित करने की दिव्य योग साधना है।


        

प्राण और अपान वायु के संतुलन की दिव्य साधना

हिमालय की गुफा में एक योगी प्राणायाम का अभ्यास करते हुए, शरीर में प्राण और अपान ऊर्जा का संतुलन तथा पृष्ठभूमि में भगवान शिव की दिव्य उपस्थिति।

लिंग पुराण के अनुसार प्राणायाम केवल श्वास का अभ्यास नहीं, बल्कि प्राणशक्ति को संतुलित कर मन, शरीर और चित्त को अनुशासित करने वाली महान योग साधना है।

लिंग पुराण के अनुसार प्राणायाम क्या है? प्राण और अपान का वास्तविक रहस्य

आज प्राणायाम को प्रायः केवल श्वास लेने और छोड़ने के अभ्यास के रूप में देखा जाता है। किन्तु लिंग पुराण में इसका स्वरूप इससे कहीं अधिक गहन और आध्यात्मिक बताया गया है।

आठवें अध्याय में प्राणायाम को योग की एक महत्वपूर्ण साधना के रूप में वर्णित किया गया है। यहाँ प्राणायाम का उद्देश्य केवल शरीर को स्वस्थ बनाना नहीं, बल्कि प्राणशक्ति को संतुलित कर मन और चित्त को स्थिर करना है।

प्राणायाम का वास्तविक अर्थ

लिंग पुराण के अनुसार शरीर में प्रवाहित होने वाली प्राणवायु ही जीवन का आधार है। प्राण और अपान वायु के निरोध को ही प्राणायाम कहा गया है।

अर्थात् प्राणायाम केवल श्वास का अभ्यास नहीं, बल्कि जीवनशक्ति को संयमित और संतुलित करने की साधना है।

प्राणायाम के तीन प्रकार

आठवें अध्याय में प्राणायाम के तीन भेद बताए गए हैं—

  • मंद प्राणायाम
  • मध्य प्राणायाम
  • उत्तम प्राणायाम

मंद प्राणायाम

बारह मात्राओं तक प्राणवायु का निरोध मंद प्राणायाम कहलाता है। यह साधना का प्रारम्भिक चरण है, जिसमें साधक धीरे-धीरे अपने अभ्यास को स्थिर करता है।

मध्य प्राणायाम

जब यही अभ्यास चौबीस मात्राओं तक पहुँचता है, तब उसे मध्य प्राणायाम कहा गया है। इस अवस्था में साधना अधिक गम्भीर और स्थिर होने लगती है।

उत्तम प्राणायाम

छत्तीस मात्राओं तक प्राणवायु का निरोध उत्तम प्राणायाम कहलाता है। यह अवस्था नियमित अभ्यास, धैर्य और अनुशासन से ही प्राप्त होती है।

धीरे-धीरे अभ्यास करने का महत्व

लिंग पुराण में संकेत मिलता है कि प्राणायाम का अभ्यास क्रमशः बढ़ाना चाहिए। योग में उतावलेपन का स्थान नहीं है।

जैसे किसी वृक्ष को विकसित होने में समय लगता है, वैसे ही प्राणायाम की सिद्धि भी नियमित अभ्यास से प्राप्त होती है।

प्राणायाम के प्रारम्भिक प्रभाव

ग्रंथ में वर्णित है कि साधना की विभिन्न अवस्थाओं में शरीर में परिवर्तन अनुभव हो सकते हैं।

मंद प्राणायाम में पसीना आना, मध्य अवस्था में शरीर में कम्पन तथा उत्तम अवस्था में शरीर का अत्यन्त हल्का अनुभव होना साधना की क्रमिक प्रगति के संकेत माने गए हैं।

इनका उद्देश्य चमत्कार का वर्णन करना नहीं, बल्कि साधना के स्वाभाविक विकास को बताना है।

प्राणायाम का महत्व

जब प्राणवायु संतुलित होने लगती है, तब मन भी धीरे-धीरे स्थिर होने लगता है। चंचलता कम होती है, एकाग्रता बढ़ती है और ध्यान के लिए अनुकूल अवस्था बनने लगती है।

इसी कारण योगमार्ग में प्राणायाम को अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।

निष्कर्ष

लिंग पुराण के अनुसार प्राणायाम केवल श्वास लेने और छोड़ने की क्रिया नहीं है।

यह प्राण और अपान वायु के संतुलन द्वारा शरीर, मन और चित्त को अनुशासित करने वाली दिव्य साधना है। इसका अभ्यास धैर्य, अनुशासन और निरन्तरता के साथ किया जाना चाहिए।


नोट: लिंग पुराण में वर्णित प्राणायाम अत्यन्त गंभीर योग-साधना का विषय है। इसका अभ्यास सदैव योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए। बिना उचित मार्गदर्शन के उन्नत प्राणायाम का अभ्यास करने से शारीरिक एवं मानसिक कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं।


हर हर महादेव।

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Disclaimer

अस्वीकरण: यह लेख लिंग पुराण के आठवें अध्याय में वर्णित प्राणायाम संबंधी शिक्षाओं के अध्ययन पर आधारित है। योग एवं प्राणायाम का अभ्यास योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए। इस लेख का उद्देश्य सनातन आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसार करना है।

हर हर महादेव।

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