इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट
"अर्धनारीश्वर: शिव और शक्ति का पूर्ण एकत्व"
अर्धनारीश्वर: शिव और शक्ति का पूर्ण एकत्व भूमिका सनातन परंपरा में भगवान शिव का स्वरूप जितना रहस्यमय है, उतना ही समग्र और समावेशी भी। वे केवल संहारक नहीं, सृजनकर्ता भी हैं। उनका यह सृजन तब संभव होता है जब वे शक्ति से एकाकार होते हैं। अर्धनारीश्वर का स्वरूप इसी दिव्य एकता का प्रतीक है — जहाँ शिव और शक्ति एक ही देह में समाहित होकर सम्पूर्ण ब्रह्मांड के संतुलन का दिग्दर्शन कराते हैं। अर्थ और भाव अर्धनारीश्वर — ‘अर्ध’ अर्थात् आधा, ‘नारी’ अर्थात् स्त्री (शक्ति), और ‘ईश्वर’ अर्थात् शिव। अतः अर्धनारीश्वर वह दिव्य रूप है जिसमें आधा भाग भगवान शिव का है और आधा देवी शक्ति का। यह न पुरुष मात्र है, न नारी मात्र — बल्कि यह पूर्णता का ऐसा प्रतीक है जिसमें स्त्री और पुरुष दोनों का संतुलन समाहित है। यह रूप ब्रह्मांडीय ऊर्जा की दोनों धाराओं का सामंजस्य है। --- पौराणिक कथा (शिवपुराण पर आधारित) सृष्टि के आदि काल में जब न तो दिन था, न रात्रि, न पृथ्वी, न आकाश, न जल, न वायु — चारों ओर केवल घोर अंधकार था, तब केवल परम तत्त्व — परब्रह्म — ही विद्यमान था। उसी परब्रह्म की इच्छा हुई कि "एक से अनेक" होकर...
रावण एवं कुंभकरण की उत्पत्ति: नारद मुनि के श्राप की रहस्यमयी कथा
रावण एवं कुंभकरण की उत्पत्ति: नारद मुनि के श्राप की रहस्यमयी कथा --- ब्रह्मर्षि नारद जी का पाश्चाताप नारद मुनि जब भगवान विष्णु की माया से मोहित होकर मोह में पड़ गए, तब उन्होंने स्वयं ही भगवान को श्राप दे दिया। जब मोह भंग हुआ, तो उन्होंने क्षमा याचना की: > “हे प्रभु! आपकी माया के वशीभूत होकर मैं अपराध कर बैठा हूं, कृपया क्षमा करें।” भगवान विष्णु ने स्नेहपूर्वक उत्तर दिया: > “हे नारद, तुम्हारे श्राप में भी कल्याण निहित है। अब संदेह त्यागकर शिवजी का ध्यान करो।” --- नारद मुनि का शिवलिंगों का दर्शन और काशी यात्रा विष्णु जी के निर्देश पर नारद जी पृथ्वीलोक आए और अनेक शिवलिंगों के दर्शन किए। वे मोक्षदायिनी नगरी काशी पहुंचे और भगवान विश्वनाथ के चरणों में नतमस्तक हुए। वहाँ से लौटते समय उन्हें एक अद्भुत अनुभव प्राप्त हुआ। --- शिव गणों से भेंट और श्राप का रहस्य स्वर्ग लौटते समय उन्हें भगवान शिव के दो गण मिले। वे बोले: > “हे ब्रह्मर्षि, आपने हमें श्राप दिया था। परंतु हम तो शिव माया से मोहित थे। कृपा करें।” नारद जी ने उत्तर दिया: > “अब मैं शांतचित हूं, लेकिन श्राप को टाल नहीं सकता। ...
"बिंदु और चंचुला: शिव तत्त्व का गूढ़ रहस्य"
"बिंदु और चंचुला: शिव तत्त्व का रहस्य" बिंदु और चंचुला: शिव तत्त्व का रहस्य जब हम शिव की बात करते हैं, तो हम केवल एक देवता की नहीं, बल्कि एक विराट तत्त्व की चर्चा करते हैं — जो समय, स्थान और रूप से परे है। शिव का यह तत्त्व दो प्रमुख रूपों में अभिव्यक्त होता है: बिंदु और चंचुला। ये दोनों प्रतीकात्मक रूप से सृजन और विनाश, स्थिरता और गति, पुरुष और प्रकृति के बीच संतुलन को दर्शाते हैं। --- बिंदु – मौन का केंद्र ‘बिंदु’ शिव का निराकार, निर्गुण और शुद्ध चेतना का प्रतीक है। यह वह मौन है जिसमें सृष्टि की उत्पत्ति होती है। बिंदु स्थिरता है, ध्यान है, समाधि है। यह शिव का वह रूप है जो किसी भी गति से अछूता है — एकदम शांत, एकदम मौन। --- चंचुला – गति की देवी ‘चंचुला’ शक्ति का गतिशील स्वरूप है। यह वही ऊर्जा है जो बिंदु को गति देती है। चंचुला बिना बिंदु के अस्थिर है और बिंदु बिना चंचुला के निष्क्रिय। यह सृष्टि की नाद (ध्वनि), गति, रचना और विस्तार का प्रतीक है — माँ शक्ति का चंचल रूप। --- शिव में दोनों का एकत्व शिव वही हैं जहाँ बिंदु और चंचुला एकाकार होते हैं। जहाँ मौन में गति समाहित होती ह...

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
Thanks for feedback