नंदीकेश्वर शिवलिंग: ऋषिका की तपस्या और भगवान शिव की कृपा | नर्मदा तट की पवित्र कथा
शिवपुराण में नर्मदा तट की एक अत्यंत पावन कथा वर्णित है।
यह कथा साध्वी ऋषिका और एक पार्थिव शिवलिंग से जुड़ी हुई है।
इसी शिवलिंग में भगवान शिव अपने अंश से सदा के लिए विराजमान हुए।
परंपरा में यही शिवलिंग “नंदीकेश्वर” नाम से प्रसिद्ध हुआ।
यह कथा भक्ति, शील और शिवकृपा की अद्भुत मिसाल है।
आइए इस पावन गाथा को श्रद्धा से स्मरण करें।
ऋषिका नर्मदा तट पर प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंग का निर्माण करती थी।
वह उसी में पूजन, जप और ध्यान करती थी।
उसकी साधना निष्काम और पूर्णतः शिवमय थी।
उसका सौंदर्य तप की आभा से दमकता था।
वह न किसी से बात करती, न संसार की ओर देखती।
उसका चित्त केवल शिव में स्थित था।
एक दिन मूढ़ नामक दैत्य ऋषिका को देखकर कामवश व्याकुल हो उठा।
उसने ऋषिका से अधर्म की याचना की, पर साध्वी ने उसकी ओर देखा भी नहीं।
क्रोधित होकर दैत्य ने भयानक रूप धारण कर भय फैलाया।
ऋषिका ने कातर भाव से “शिव, शिव” पुकारा।
तत्काल भगवान शिव प्रकट हुए और दैत्य को भस्म कर दिया।
भगवान शिव ने ऋषिका से कहा कि कोई वर मांगो।
ऋषिका ने कहा, “हे प्रभु, केवल आपकी भक्ति प्राप्ति ही मेरी इच्छा है।”
भगवान शिव प्रसन्न होकर बोले, “और कोई वर भी मांगो।”
ऋषिका ने कहा, “आप इस पार्थिव शिवलिंग में सदा के लिए विराजमान हो जाएँ।”
तब शिव अपने पूर्ण अंश से शिवलिंग में विराजमान हुए।
उसी समय माता गंगा ने भी एक वर माँगा।
उन्होंने प्रार्थना की कि उन्हें वर्ष में एक बार इस तीर्थ में आने का अवसर मिले।
तब से वैशाख मास की सप्तमी को गंगा जी नर्मदा से मिलती हैं।
यह मिलन लोककल्याण और पापक्षालन का प्रतीक माना गया है।
इस दिन नंदीकेश्वर तीर्थ की महिमा विशेष रूप से बढ़ जाती है।
इस दिन नंदीकेश्वर तीर्थ पर संगम और शिवकृपा का अद्भुत दृश्य दिखाई देता है।
भक्तगण श्रद्धा से जल स्नान और पूजा करते हैं।
ऋषिका की भक्ति एवं शिवकृपा सदा जीवित रहती है।
यह पर्व श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है।
यह लेख शिवपुराण में वर्णित साध्वी ऋषिका तथा नर्मदा तट स्थित पार्थिव शिवलिंग की कथा पर आधारित है, जो परंपरा में “नंदीकेश्वर शिवलिंग” नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसका उद्देश्य धार्मिक श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक चेतना को प्रोत्साहित करना है। पाठक इसे अपनी आस्था एवं विवेक के अनुसार ग्रहण करें। < <

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