लिंग पुराण अध्याय 8 के अनुसार शान्ति, प्रशान्ति, दीप्ति और प्रसाद क्या हैं? दस प्राणवायु का दिव्य रहस्य
लिंग पुराण अध्याय 8 के अनुसार शान्ति, प्रशान्ति, दीप्ति और प्रसाद क्या हैं? जानिए दस प्राणवायु और तुरीया सिद्धि का रहस्य
दस प्राणवायु और चतुर्विध दिव्य अवस्थाएँ
योगशास्त्र में प्राणायाम का उद्देश्य केवल श्वास को नियंत्रित करना नहीं है, बल्कि शरीर, मन, बुद्धि और प्राणों को संतुलित करना भी है। लिंग पुराण के अध्याय 8 में भगवान शिव प्राणायाम के अभ्यास से प्राप्त होने वाली चार दिव्य अवस्थाओं—शान्ति, प्रशान्ति, दीप्ति और प्रसाद—का अत्यंत गूढ़ वर्णन करते हैं। साथ ही दस प्राणवायुओं के स्वरूप और उनके संतुलन का भी विस्तार से वर्णन मिलता है।
शान्ति, प्रशान्ति, दीप्ति और प्रसाद का अर्थ
लिंग पुराण के अनुसार—
- शान्ति – सहज एवं आगन्तुक पापों का नाश होना।
- प्रशान्ति – वाणी पर पूर्ण संयम स्थापित होना।
- दीप्ति – जीवन में ज्ञान और प्रकाश का उदय होना।
- प्रसाद – इन्द्रियों, बुद्धि तथा प्राणवायु आदि की पूर्ण प्रसन्नता और संतुलन की अवस्था।
इन चार अवस्थाओं में प्रसाद को विशेष महत्व दिया गया है, क्योंकि यह सम्पूर्ण आंतरिक संतुलन का प्रतीक है।
दस प्राणवायु का रहस्य
लिंग पुराण में शरीर में कार्य करने वाली दस वायुओं का उल्लेख मिलता है—
- प्राण
- अपान
- समान
- उदान
- व्यान
- नाग
- कूर्म
- कृकल
- देवदत्त
- धनंजय
इनका कार्य इस प्रकार बताया गया है—
- प्राण – जीवन शक्ति का संचालन करता है।
- अपान – नीचे की ओर होने वाली क्रियाओं का संचालन करता है।
- समान – शरीर में समता और संतुलन स्थापित करता है।
- उदान – ऊपर की ओर प्रेरित करने वाली शक्ति है।
- व्यान – सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर विभिन्न अंगों में ऊर्जा का संचार करता है।
- नाग – डकार आदि क्रियाओं में सक्रिय रहता है।
- कूर्म – नेत्रों के उन्मीलन (पलक झपकने) जैसी क्रियाओं में कार्य करता है।
- कृकल – छींक आदि क्रियाओं में सक्रिय रहता है।
- देवदत्त – जम्हाई की क्रिया से संबंधित है।
- धनंजय – मृत्यु के बाद भी कुछ समय तक शरीर में स्थित रहने वाली वायु कही गई है।
प्राणायाम और दस प्राणवायु
लिंग पुराण के अनुसार जो साधक विधिपूर्वक प्राणायाम का अभ्यास करता है, वह इन दसों प्राणवायुओं को संतुलित करने की दिशा में अग्रसर होता है। जब ये वायु प्रसन्न और संतुलित होती हैं, तब साधक को शान्ति, प्रशान्ति, दीप्ति और प्रसाद की प्राप्ति होने लगती है।
इन्हीं में प्रसाद नामक चौथी सिद्धि को "तुरीया" सिद्धि भी कहा गया है। यह साधक के आंतरिक संतुलन, प्रसन्नता और आध्यात्मिक उन्नति का सूचक मानी गई है।
निष्कर्ष
लिंग पुराण के अध्याय 8 का यह संदेश स्पष्ट करता है कि प्राणायाम केवल श्वास की क्रिया नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जीवन को संतुलित करने वाली साधना है। जब प्राण, इन्द्रियाँ और बुद्धि समरस हो जाते हैं, तभी साधक शान्ति, प्रशान्ति, दीप्ति और प्रसाद जैसी दिव्य अवस्थाओं का अनुभव करने की दिशा में अग्रसर होता है।
महत्वपूर्ण नोट: लिंग पुराण में वर्णित प्राणायाम अत्यंत गंभीर योगसाधना का विषय है। इसका अभ्यास सदैव योग्य एवं अनुभवी गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए। बिना उचित मार्गदर्शन के अभ्यास करने से शारीरिक एवं मानसिक कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

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