लिंग पुराण के अनुसार सगर्भ और अगर्भ प्राणायाम क्या हैं? जानिए उत्तमोत्तम प्राणायाम का रहस्य

 

लिंग पुराण के अनुसार प्राणायाम केवल श्वास का नियंत्रण नहीं, बल्कि मंत्र, एकाग्रता और निरंतर अभ्यास के माध्यम से चेतना को ऊँचा उठाने वाली दिव्य साधना है।

मंत्र, प्राण और ध्यान का दिव्य समन्वय
हिमालय की गुफा में मंत्र-जप सहित प्राणायाम करते हुए योगी, शरीर में प्रवाहित प्राणशक्ति तथा पृष्ठभूमि में भगवान शिव की दिव्य उपस्थिति।





लिंग पुराण के अनुसार मंत्र सहित किया गया प्राणायाम साधक के मन को अधिक एकाग्र बनाकर आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में अग्रसर करता है।


लिंग पुराण के अनुसार सगर्भ और अगर्भ प्राणायाम क्या हैं? उत्तमोत्तम प्राणायाम का रहस्य

प्राणायाम का सामान्य परिचय प्राप्त करने के बाद लिंग पुराण उसके और भी गहन स्वरूप का वर्णन करता है। यहाँ केवल श्वास को रोकने की विधि नहीं बताई गई, बल्कि यह भी समझाया गया है कि साधक का अभ्यास किस प्रकार धीरे-धीरे उच्च अवस्था तक पहुँचता है।

सगर्भ और अगर्भ प्राणायाम

लिंग पुराण में प्राणायाम के दो भेद बताए गए हैं—

  • सगर्भ प्राणायाम
  • अगर्भ प्राणायाम

जप सहित किया गया प्राणायाम सगर्भ प्राणायाम कहलाता है। इसमें श्वास के साथ मंत्र-जप भी जुड़ा रहता है, जिससे साधक का मन अधिक एकाग्र होता है।

जप के बिना किया गया प्राणायाम अगर्भ प्राणायाम कहा गया है। इसमें भी साधना होती है, किन्तु मंत्र के सहारे मन को स्थिर करने का आधार नहीं रहता।

प्राणायाम की क्रमिक अवस्था

आठवें अध्याय में बताया गया है कि नियमित अभ्यास के साथ साधक के शरीर और मन में क्रमशः परिवर्तन होने लगते हैं।

प्रारम्भिक अवस्था में पसीना आ सकता है।

अभ्यास बढ़ने पर शरीर में कंपन का अनुभव हो सकता है।

और आगे चलकर साधक को शरीर अत्यन्त हल्का प्रतीत होने लगता है।

इन अवस्थाओं का उद्देश्य चमत्कार दिखाना नहीं, बल्कि साधना की क्रमिक प्रगति का संकेत देना है।

उत्तमोत्तम प्राणायाम

लिंग पुराण में आगे उस उच्च अवस्था का भी वर्णन मिलता है, जहाँ निरंतर अभ्यास के कारण साधक के भीतर विशेष परिवर्तन अनुभव होने लगते हैं।

शरीर में उष्णता उत्पन्न होने से पसीना आने लगता है। चित्त गहन एकाग्रता की ओर अग्रसर होता है और साधक को ऐसा अनुभव हो सकता है मानो शरीर अत्यन्त हल्का हो गया हो।

इन अनुभवों को साधना की उपलब्धि मानकर रुक जाना उद्देश्य नहीं है। वास्तविक लक्ष्य मन की स्थिरता और आत्मिक उन्नति है।

निरंतर अभ्यास का महत्व

इस अध्याय का एक महत्वपूर्ण संदेश यह है कि योग में कोई भी अवस्था एक ही दिन में प्राप्त नहीं होती।

नियमित अभ्यास, धैर्य और संयम के साथ ही साधक धीरे-धीरे आगे बढ़ता है।

योग में उतावलेपन का नहीं, बल्कि निरंतरता का महत्व बताया गया है।

निष्कर्ष

लिंग पुराण के अनुसार प्राणायाम केवल श्वास का अभ्यास नहीं है। जब उसमें मंत्र, एकाग्रता और नियमित साधना जुड़ जाती है, तब वह साधक के अंतर्मन को परिष्कृत करने का माध्यम बन जाता है।

प्राणायाम का वास्तविक उद्देश्य किसी विशेष अनुभूति की खोज नहीं, बल्कि मन की स्थिरता, आत्मसंयम और आध्यात्मिक उन्नति है।

नोट: लिंग पुराण में वर्णित प्राणायाम अत्यन्त गंभीर योग-साधना का विषय है। इसका अभ्यास सदैव योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए। बिना उचित मार्गदर्शन के उन्नत प्राणायाम का अभ्यास करने से शारीरिक एवं मानसिक कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

हर हर महादेव।


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Disclaimer

अस्वीकरण: यह लेख लिंग पुराण के आठवें अध्याय में वर्णित प्राणायाम संबंधी शिक्षाओं के अध्ययन पर आधारित है। योग एवं प्राणायाम का अभ्यास सदैव योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए। इस लेख का उद्देश्य सनातन आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसार करना है।

हर हर महादेव।

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