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मई, 2022 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

शिव गीता में श्रीराम का भक्ति रहस्य: भगवान शिव और राम का अद्भुत मिलन

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  monthan.blogspot.com 🌺 शिव गीता में श्रीराम का भक्ति रहस्य 🌺 भगवान शिव की भक्ति और पूर्ण समर्पण से मनुष्य वरदान देने में भी सक्षम हो जाता है। इसका उदाहरण महर्षि जमदग्नि हैं, जिन्होंने अपने पुत्र परशुराम को यह वरदान दिया कि कोई भी राजा उन्हें युद्ध में पराजित नहीं कर सकेगा। इसी प्रकार राजा शांतनु ने भी भीष्म पितामह को आशीर्वाद दिया — “पुत्र! तू इच्छा-मृत्यु को प्राप्त होगा।” शिव गीता में वर्णित है कि जब रावण ने माता सीता का अपहरण किया, तब भगवान श्रीराम व्याकुल होकर वृक्षों, पशुओं से पूछ रहे थे — “क्या तुमने मेरी वैदेही को देखा है?” तब महामुनि अगस्त्य ने कहा — “हे राम, अपने स्वरूप को पहचानिए। आप और त्रिदेवों में कोई भेद नहीं। केवल शिव की उपासना ही आपके वियोग-संताप को शांत कर सकती है।” अगस्त्य मुनि के उपदेश पर श्रीराम ने भगवान शिव की आराधना की। प्रसन्न होकर भगवान शिव ने कहा — “हे राम, रावण मेरा भक्त है, पर मैं धर्म का साथ दूँगा। जो धर्म के मार्ग पर चलता है, उसकी विजय निश्चित है।” श्रीराम को भगवान शिव की कृपा से ...

भगवान शिव और कुबेर: धनतेरस पर शिव कृपा से प्राप्त धन और वैभव का रहस्य

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🔱 भगवान शिव और कुबेर: धनतेरस पर शिव कृपा से प्राप्त वैभव का रहस्य 🔱 हर हर महादेव 🙏 | धनतेरस विशेष लेख भगवान शिव की पूजा और उनकी कृपा से धन, वैभव एवं सुख की प्राप्ति संभव है। धनतेरस का पावन पर्व केवल लक्ष्मी पूजा का ही नहीं, बल्कि कुबेर और भगवान शिव की संयुक्त आराधना का भी विशेष अवसर है। शिवजी की कृपा से ही कुबेर धनाध्यक्ष बने और कैलाश पर उनका दिव्य निवास हुआ। ✨ कुबेर की कठोर तपस्या कुबेर मूलतः रावण के सौतेले भाई थे, जिन्होंने अपने पूर्व जन्म के पापों के शुद्धिकरण हेतु कठोर तप किया। उन्होंने हिमालय के उत्तरी क्षेत्र में हजारों वर्षों तक भगवान शिव का ध्यान किया। तपस्या इतनी गहन थी कि उनके शरीर की हड्डियाँ तक दिखाई देने लगीं। 🌺 शिव कृपा और धनाध्यक्ष पद की प्राप्ति कुबेर की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव स्वयं माता पार्वती के साथ उनके समक्ष प्रकट हुए। भगवान शिव ने उन्हें दिव्य दृष्टि प्रदान की और आशीर्वाद दिया — “हे कुबेर! तुम समस्त लोकों के धनाध्यक्ष बनो।” भगवान शिव के वरदान से कुबेर को अलकापुरी नामक नगर प्राप्त हुआ, जहाँ वे देवताओं के कोषाध्यक्ष के रू...

शिव का अपने भक्त की पूजा में शामिल होकर सेवा करना — भगवान भक्त के वश में क्यों होते हैं?

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               monthan.blogspot.com   शिव का अपने भक्त की पूजा में शामिल होकर सेवा करना ब्राह्मण की शिव पूजा बहुत पुराने समय की बात है। एक गरीब ब्राह्मण नास्तिको के गाँव में रहता था। वह भगवान शिव का परम भक्त था। उसकी पत्नी दुष्ट स्वभाव की थी। वह अपने मन को भगवान शिव के चरणों में स्थिर रखते हुए सब कुछ सहन करता और केवल संसार के भलाई के लिए प्रार्थना करता। ब्राह्मण रोज ब्रह्ममुहुर्त में गंगा जल चढ़ाता और कहता कि हे प्रभु, सारे प्राणियों में आपका निवास है। शिव जी का भेष धारण भगवान शिव एक युवक का रूप धारण कर ब्राह्मण के घर पहुंचे और नौकरी की प्रार्थना की। ब्राह्मण ने कहा कि वह गरीब है, पर भगवान शिव ने कहा कि उन्हें केवल दो वक्त की रोटी चाहिए। इस प्रकार भगवान शिव उस ब्राह्मण दंपत्ति की सेवा करने लगे। शिव जी का सेवक बनना ब्राह्मण सुबह पूजा करता और भगवान शिव उसकी सेवा में लगे रहते। भगवान शिव गंगा जल लाते, पुष्प एवं बेलपत्र लेकर आते, और पूजा पाठ में सहयोग करते। बाबा धाम की यात्रा एक दिन ब्राह्मण बाबा धाम जाने का ...

नारदजी का अभिमान – देवर्षि नारद की तपस्या और अहंकार का पाठ

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                    monthan.blogspot.com              नारदजी का अभिमान एक बार देवर्षि नारद तपस्या करने के लिए एक रमणीक एकांत स्थान पर गए। यहां पहुंचते ही उन्हें अद्भुत शांति का अनुभव हुआ। नारद जी ने सोचा – “यह तप के लिए सबसे श्रेष्ठ स्थान है।” इंद्र की चिंता और कामदेव का प्रयास तपस्या करते हुए नारद जी को देख, देवराज इंद्र घबरा गए। उन्होंने कामदेव को भेजा, ताकि नारद जी की तपस्या भंग की जा सके। परन्तु कामदेव असफल रहे। कारण: इस स्थान पर पहले देवाधिदेव महादेव ने तपस्या की थी। इसलिए कामदेव नारद जी की तपस्या को भंग नहीं कर पाए। ब्रह्मा जी के द्वारा समझाना नारद जी अपने पिता ब्रह्मा जी के पास गए और बोले – “हे पिता, मैंने कामदेव पर विजय प्राप्त की।” ब्रह्मा जी ने उन्हें समझाया कि इसे किसी और से न कहें। लेकिन नारद जी अहंकार के वशीभूत होकर शिव लोक चले गए। शिवलोक में नारद जी नारद जी भगवान शिव से कहने लगे – “मैं काम पर विजय प्राप्त कर लिया हूं।” भगवान शिव ने अहंकार को दूर करने हेतु नारद जी क...

दक्ष प्रजापति का यज्ञ — शिव पार्वती वार्ता | सती का आत्मदाह और वीरभद्र द्वारा यज्ञ विध्वंस

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mohanan.blogspot.com दक्ष प्रजापति का यज्ञ - शिव पार्वती वार्ता दक्ष प्रजापति का यज्ञ शिव पार्वती वार्ता 1. शिव पार्वती वार्ता दक्ष प्रजापति द्वारा आयोजित यज्ञ में भगवान शिव को प्रजापति ने आमंत्रित नहीं किया था। एक दिन सती भगवान शिव जी के साथ कुछ बातें कर रही थीं। 2. देवताओं का आकाश मार्ग से गमन स्वर्ग के सभी देवगण नाना प्रकार के जेवरों और रेशमी वस्त्र धारण कर आकाश मार्ग से कहीं जा रहे थे। माता सती ने देवराज इंद्र से पूछा कि ये सभी देवगण कहां जा रहे हैं। इंद्र बोले, "आपके पिता के यहाँ यज्ञ हो रहा है।" 3. सती का भगवान शिव से प्रार्थना करना सती ने प्रार्थना की कि हमें भी यज्ञ में जाना चाहिए। भगवान शिव मुस्कुराते हुए बोले कि तुम्हारे पिता मुझसे द्वेष रखते हैं, इसलिए मुझे आमंत्रित नहीं किया गया। बिना आमंत्रण के जाना उचित नहीं। परंतु सती जिद करती हैं और शिव की अनुमति लेकर यज्ञ स्थल पहुँचती हैं। 4. सती का योगाग्नि के द्वारा आत्मदाह सती ने देखा कि यज्ञ में उनके पति के लिए कोई हिस्सा नहीं है। यह देखकर वह क्रोध से आगबबूला होकर योग शक्ति द्वारा स्वयं को ...

ईश्वर की प्राप्ति और मोक्ष का मार्ग | ज्ञान, भक्ति और कर्म से आध्यात्मिक विकास

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monthan.blogspot.com ईश्वर की प्राप्ति और मोक्ष ईश्वर की प्राप्ति और मोक्ष का मार्ग ईश्वर को प्राप्त करने या जानने के पूर्व हमें सबसे पहले परमात्मा और आत्मा की भिन्नता को समझना होगा। शास्त्रों में कहा गया है कि ईश्वर अविनाशी है और आत्मा भी अविनाशी है। इसका मतलब यह है कि हमारा जन्म ही ईश्वर की प्राप्ति के लिए हुआ है। शरीर को चलाने के लिए हमें कर्म तो करना ही होगा, लेकिन हमारा असली उद्देश्य परमात्मा की प्राप्ति होना चाहिए। यही उद्देश्य प्राप्त करने के लिए हमें मानव का शरीर मिला है। 8,400,000 योनियों में जाने के बाद मानव जन्म मिलता है। मानव शरीर ही मोक्ष का द्वार है। मोक्ष वह अवस्था है जिसमें आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है। शास्त्रों में मोक्ष प्राप्त करने के लिए कर्म, ज्ञान और भक्ति को विशेष रूप से महत्व दिया गया है। जैसे नींद में हम दिन भर की बातें भूल जाते हैं और सुबह उन्हें याद करते हैं, मृत्यु में भी यह सब याद नहीं रहता। लेकिन योगी के साथ ऐसा नहीं होता। उनकी मृत्यु के बाद उन्हें पूर्व जन्म की सारी जानकारी याद रहती है। इस कारण उन्हें अमर कहा जाता है...

रूद्र की महिमा और शिवजी की असीम कृपा | भक्ति, मोक्ष और आत्मज्ञान का दिव्य रहस्य”

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monthan.blogspot.com ॐ रूद्र की महिमा यजुर्वेद के 16वें अध्याय में रुद्र की महिमा का वर्णन होने के कारण ही 'रुद्राध्याय' नाम से प्रसिद्ध है। वेदों के अतिरिक्त कई स्मृतियों और इतिहास, पुराणों में भी शंकर जी का सुंदर वर्णन किया गया है। ॐ शिवजी की महिमा लेखनी से संभव नहीं है। क्योंकि भगवान शिव अनंत गुणों के स्वामी हैं। उनके गुणों का वर्णन करने के लिए हजारों जन्म कम पड़ेंगे। ॐ भगवान शिव अनादि, अनंत, अजन्मा और असीम विभूतियों वाले देव हैं। शिव की कृपा से सारे दु:ख दूर हो जाते हैं। ॐ कोई भी व्यक्ति बड़ा पापी हो, तो भी यदि अंत समय में 'शिव' नाम का उच्चारण करता है, तो उसे यमराज का द्वार नहीं देखना पड़ता। शिव के सारे नाम मोक्ष प्रदान करते हैं। ऊँ नमः शिवाय | हर-हर महादेव ॐ यह तो गोस्वामी तुलसीदास जी भी मानते हैं कि रामचरितमानस और संसार के विशेष काव्य नाटक सब भगवान की कृपा से ही सुंदर से सुंदर बने हैं, और उनकी विश्व में प्रचार हो पाया है। गोस्वामी तुलसीदास जी जिस समय रामचरितमानस को लिख रहे थे, उस समय कई लोग तुलसीदास जी को नीचा दिखाने के लिए रोज कोई...

“शिव और पार्वती की कथा: तपस्या, भक्ति और ज्योतिर्मय रहस्य”

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ॐ 🕉️ शिव और माता पार्वती की कथा शिव सारे ब्रह्मांडों के संचालन कर्ता हैं। माता पार्वती जी ने अपनी तपस्या द्वारा भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त किया। यह कथा उनके अद्भुत प्रेम और भक्ति का प्रतीक है। ॐ 🌺 माता पार्वती की तपस्या माता पार्वती जी ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया। सप्त ऋषियों ने उन्हें चेतावनी दी, लेकिन पार्वती जी ने निश्चय किया कि शिव के अलावा किसी और को पति के रूप में स्वीकार नहीं करेंगी। ॐ 🕉️ शिव पूजा एवं महामृत्युंजय मंत्र शिव पूजा एवं महामृत्युंजय मंत्रों के उच्चारण मात्र से रोगों का नाश, जीवन की कला का निर्माण, संगीत, नृत्य, गायन और वादन जैसी सभी कलाओं की उत्पत्ति होती है। शिवजी ने ही यह सब संभव किया। ॐ ⚡ ब्रह्मा और विष्णु का विवाद शिव अनादिकाल से हैं। एक बार ब्रह्मा और विष्णु के बीच कौन बड़ा है, इस पर विवाद हुआ। तभी एक ज्योतिर्मय स्तंभ प्रकट हुआ, जो न तो शुरू हुआ और न ही समाप्त। अंततः अर्धनारीश्वर रूप में शिव प्रकट हुए और सृष्टि का संचालन तय किया। ॐ 🛕 शिवलिंग और ज्योतिर्लिंग शिवलिंग, शिव का निराकार रूप है। अर्धना...