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ॐ नमः शिवाय का महत्व और इसका सही जाप – लाभ, विधि एवं मंत्र साधना

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http://monthan.blogspot.com/2022/05/secret-of-lord-shiva.ht ॐ ऊँ नमः शिवाय मंत्र की महिमा ॐ नमः शंभवाय च मयोभवाय च नमःशंकराय च मयस्कराय च नमःशिवाय च शिवतरार च। 'ऊँ मीढुष्टम शिवतम शिवो नः सुमना भव।' (यजुर्वेद, 16.51) भगवान शिव जी माता पार्वती जी के साथ पहाड़ की ऊँचाई पर बैठे हुए थे। माता पार्वती जी ने पूछा, "हे भोलेनाथ, कलयुग में आपकी किस प्रकार पूजा करने से सब कुछ प्राप्त होगा?" भोलेनाथ ने उत्तर दिया कि पंचाक्षर मंत्र बहुत शक्तिशाली है। इसे जपने से मनुष्य आधिदैविक पाप से मुक्त होता है और धन-संपत्ति, ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। ॐ ऊँ नमः शिवाय मंत्र से मिलने वाले फल घर में जाप करने पर 100 गुना फल। नदी के किनारे जाप करने पर हजार गुना फल। देवालय में शिवलिंग के सामने जाप करने पर करोड़ों गुना फल। साधक को संपूर्ण सिद्धियाँ और भौतिक समृद्धि प्राप्त होती है। भगवान शिव का साक्षात्कार भी संभव  हो सकता है। ॐ पूर्ण कामनाओं की पुष्टि करने वाला मंत्र पंचाक्षर मंत्र छोटा है, लेकिन इसमें अनेक अर्थ और शक्तियाँ ...

शिव की आराधना और पूजा – भस्म, व्रत, मंत्र साधना और आध्यात्मिक लाभ

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शिव की आराधना और पूजा -भस्म, व्रत,मंत्र साधना अजय स्मरामि — जब कोई साधक अपने अंतर्मन से भगवान शिव का स्मरण करता है, तब वह परम शांति, ज्ञान और मोक्ष की ओर अग्रसर होता है। यह ब्लाग शिव-भक्ति के नियम, साधना और व्रत विधियों को सरल और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करता है। शिव पूजा के नियम सच्चा साधक अपनी कामना के साथ, शुद्ध हृदय और एकाग्र मन से भगवान शिव की आराधना करता है। चांदनी रात में या गंगा तट पर बैठकर “शिव-शिव” का उच्चारण करना। अपना सर्वस्व अर्पित कर, कर्मों के फल को ईश्वर के हाथ में छोड़ना। गंगाजल से स्नान करके, पवित्र भाव से विल्व पत्र, पुष्प और जल से पूजा करना। भजन और ध्यान में लीन होकर सांसारिक यश, धन और परिवार को पीछे रखकर भगवान शिव की आराधना करना। भस्म का महत्व महर्षि दुर्वासा के पितृदर्शन की कथा के अनुसार, जब उन्होंने कुम्भीपाक नरक के प्राणियों को देखा, तो यमदूतों से भस्म का रहस्य जाना। भगवान शिव मुस्कुराए और बोले — “दुर्वासा के दर्शन से गिरी भस्म ने ही उन्हें मुक्त किया।” इसीलिए शिव पूजा में भस्म का प्रयोग अत्यंत पवित्र माना गया है। व्रत और विधियाँ ...

भगवान शिव का पाशुपत व्रत | लिंग पुराण कथा और महत्व

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भगवान शिव का पाशुपत व्रत भगवान शिव का पाशुपत व्रत लिंग पुराण में पाशुपत व्रत का विशेष उल्लेख मिलता है। यह व्रत साधक को पशु भाव से मुक्ति और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है। साधक इस व्रत के माध्यम से भगवान शिव की कृपा प्राप्त कर सफल और पुण्यात्मा जीवन जी सकता है। मेरु पर्वत पर देवताओं का आगमन देवता ब्रह्मा, अग्नि, इंद्र, वायु, वरुण, सूर्य, चंद्र और कुबेर आदि, भगवान विष्णु के गरुड़ पर बैठकर भगवान शिव के मेरु पर्वत पर पहुँचे। पर्वत सुंदर और पुण्यात्मा था, शिखर पर शिवपुर स्थित था। पर्वत विभिन्न वृक्षों से आच्छादित था और वहां हाथी, मृग, सिंह, भालू, बाघ और अन्य जीव विचरण कर रहे थे। प्रथम पुर में प्रवेश देवताओं ने शिवपुर की भव्यता देखी और अवाक रह गए। नाना प्रकार के स्वर्णमहल और बहुमूल्य रत्नों से सुसज्जित खंभों से पुर सुसज्जित था। दूसरे पुर में प्रवेश दूसरे पुर में देवताओं ने अप्सराओं और सुंदर कन्याओं को नृत्य करते हुए देखा। उनके वस्त्र कमल के फूल जैसे थे और आभूषण कीमती रत्नों से अलंकृत थे। यहां की शोभा इंद्र के महल से भी अधिक थी। तीसरे पुर में प्रवेश तीसरे पु...

शिव की भक्ति और साधना

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  शिव पूजा से सभी का कल्याण | भगवान शिव की महिमा और लाभ शिव पूजा से सभी का कल्याण किस प्रकार होता है? भगवान शिव का स्वभाव भगवान शिव भोले कहलाते हैं, आशुतोष हैं, निश्चल, निष्कपट और महात्याग की प्रतिमूर्ति हैं। वे अनादि, अनंत, अजर और अमर हैं। भगवान शिव के न आदि का पता चलता है, न ही अंत का। शिव पूजा सदियों से चली आ रही है और खुदाई से प्राप्त मूर्तियां इसे प्रमाणित करती हैं। शिव पूजा की परंपरा भगवान शिव की पूजा सदियों से चली आ रही है। आज भी यह परंपरा उसी भक्ति और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है। इस पूजा के माध्यम से भक्तों का कल्याण होता है और उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं। शिव का स्वभाव भगवान शिव आशुतोष हैं। थोड़ी सी पूजा में ही खुश हो जाते हैं। शास्त्रों में वर्णित है कि किस प्रकार के मनुष्य शिव की पूजा करके किस लोक को प्राप्त करते हैं। लिंग पुराण में स्पष्ट वर्णन है कि: क्रोध में पूजन करने वाला राक्षसों के स्थान को प्राप्त करता है। अभ्यक्ष भोजन का मनुष्य भक्षणर, शिव जी की पूजा करके यक्षलोक को प्राप्त करता है। नृत्य गण करने वाला गंधर्व लोग प्रा...

शिवरात्रि की शिक्षा और ओम नमः शिवाय मंत्र की महिमा | शिव भक्ति का मार्ग

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शिव का दर्शन कैसे करें शिव का दर्शन कैसे करें 1. शिव दर्शन और चिंतन हम अक्सर केवल शरीर के सुख के लिए भोग-विलास की चीजें खरीदते हैं। प्रतिष्ठा बढ़ाने और इच्छाएँ पूरी करने के लिए धन की आवश्यकता होती है। जब मनचाही वस्तुएँ नहीं मिलतीं, तो चिंता होती है। शिव का दर्शन करने का अर्थ है: चिंता छोड़ना और चिंतन करना अपने मन और विचारों को शिव के वातावरण में लगाना शरीर की चिंता छोड़कर आत्माभिमुख होना भगवान शिव सभी प्राणियों के हृदय में सूक्ष्म रूप से स्थित हैं। उन्हें देखने के लिए दिव्य दृष्टि चाहिए। 2. शारीरिक कर्म और मानसिक कर्म भगवान शिव के दर्शन के लिए केवल शरीर ही नहीं, मन का निर्मल होना भी आवश्यक है। कथा: शिवरात्रि मेला शिवरात्रि मेले में अधिकांश लोग केवल मौज-मस्ती के लिए आए। भगवान शिव ने एक अपाहिज पति और अत्यंत सुंदर पत्नी की रचना की। लोग सुंदर स्त्री के पीछे लगे, लेकिन एक युवक पहले भगवान शिव की पूजा करने आया। भगवान शिव ने कहा: “यह मेरा वास्तविक भक्त है।” सीख: वाचा (वचन), मनसा (मन), और कर्मणा (कर्म) से पवित्र होकर भक्ति करें। शरीर और मानसिक कर्म से कल्याण...

Shiv pujaभगवान शिव की भागीरथ पर कृपा

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भागीरथ गंगा कथा भागीरथ गंगा कथा प्रस्तावना प्राचीन भारतीय संस्कृति में गंगा अवतर‍ण की कथा अत्यंत पवित्र और प्रेरणादायी है। यह कथा केवल नदी की उत्पत्ति की नहीं, बल्कि तपस्या, धैर्य और लोककल्याण के लिए किए गए त्याग की है। राजा सगर और उनके वंशज सूर्यवंशी राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। उनके यज्ञ का घोड़ा इन्द्र द्वारा छिपा दिया गया, जिसे खोजते हुए सगरपुत्र कपिल मुनि के आश्रम पहुँचे। वहां अशुद्ध दृष्टि से घोड़े को देखने पर कपिल मुनि के क्रोध से 60,000 सगरपुत्र भस्म हो गए। अंशुमान और दिलीप राजा सगर के पौत्र अंशुमान और फिर दिलीप ने पितरों की मुक्ति के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाने का प्रयास किया, किंतु सफल न हो सके। राजा भगीरथ की तपस्या राजा भगीरथ ने कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा अवतरित होने को तैयार हुईं, किंतु उनके तीव्र वेग को संभालने के लिए भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण किया और धीरे-धीरे उन्हें पृथ्वी पर छोड़ा। गंगा अवतरण और पितरों की मुक्ति गंगा के पृथ्वी पर आगमन से न केवल सग...

नवरात्रि पूजा और माता दुर्गा के नौ रूपों का महत्व

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नवरात्रि के दिनों में देवी दुर्गा की पूजा आपका ब्राउज़र ऑडियो टैग सपोर्ट नहीं करता। ॐ दुं दुर्गायै नमः धर्म का महत्व माता के नौ रूप महिषासुरमर्दिनी नवरात्रि का अर्थ सिद्धिदात्री धर्म का महत्व भारत के अन्दर धर्म को विशेष रूप से महत्व दिया गया है। धर्म की महिमा अपरंपार है। भारत में सभी धर्मों के लोग रहते हैं और अपने-अपने धर्मों को हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। यही कारण है कि पूरे विश्व में भारतीय संस्कृति को अत्यधिक महत्व दिया जाता है। नवरात्री भारतीयों का एक प्रमुख त्योहार है और यह पर्व माँ दुर्गा देवी को समर्पित है। माता के नौ रूपों के देवता शैलपुत्री – माता पार्वती का प्रथम रूप ब्रह्मचारिणी – तपस्या और ज्ञान की देवी चन्द्रघण्टा – साहस और शक्ति की देवी कूष्मांडा – सृष्टि की रचनात्मक शक्ति स्कंदमाता – माता और मातृत्व का रूप कात्यायनी – साहस और विजय की देवी कालरात्रि – बुराई के विनाश की देवी महागौरी – शुद्धता और सौंदर्य की देवी सिद्धिदात्री – सभी सिद्धियाँ देने वाली देवी महिषासुरमर्दिनी मान्यता है कि दुर्गा जी...

पुनर्जन्म और आत्मा की अमर यात्रा | मोक्ष की प्राप्ति

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पुनर्जन्म एक अत्यंत विचारणीय विषय है। प्राचीन काल में इसके सिद्धांत को कई देशों और धार्मिक मान्यताओं में विभिन्न रूपों में देखा गया। कुछ मान्यताओं के अनुसार, यदि शरीर मर जाता है, तो आत्मा भी मर जाती है। लेकिन भारतीय दर्शन कहता है कि केवल शरीर नश्वर है, आत्मा नश्वर नहीं — यह अजर, अमर और अविनाशी है। यह प्रश्न इतना जटिल है कि भगवान शिव के परम भक्त नचिकेता ने मृत्यु के देवता यम से इसका उत्तर जानने के लिए प्रार्थना की थी। आधुनिक विज्ञान इसे स्वीकार नहीं करता, क्योंकि वैज्ञानिक केवल शरीर और पदार्थ को जीवन मानते हैं। 🕉️ वेदों का सिद्धांत वेदों में कहा गया है कि आत्मा शरीर की मृत्यु के साथ नहीं मरती। मानव अपने कर्मों के अनुसार संस्कार अर्जित करता है। उसके अच्छे और बुरे कर्मों के अनुसार, आत्मा को नया शरीर प्राप्त होता है। 📜 ऋग्वेद के अनुसार आत्मा शरीर के पांच तत्वों से बनती है। मृत्यु के बाद यह शरीर पांच तत्वों में विलीन हो जाता है, लेकिन आत्मा अमर रहती है और नया शरीर धारण कर लेती है। अथर्ववेद में भी यही प्रतिपादन है कि जीवात्मा के पिछले कई जन्मों के कर्मों...

विश्वव्यापी भगवान शिव: दया, भक्ति और पंचतत्व पूजा की महिमा

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विश्वव्यापी भगवान शिव विश्वव्यापी भगवान शिव शिव की दया :- परम दयालु प्रभु भगवान शिव, दया के सागर हैं। हनुमान जी से युद्ध करते समय केवल हनुमान जी की कीर्ति को सारी दुनिया में फैलाने के लिए — अपने भक्त को वंदनीय बनाने हेतु भगवान शिव अपने ही भक्त से हार गए। जब राजा शिवमणि ने कहा — "प्रभु, आपने मुझे युद्ध न रोकने का वचन दिया था, और भगवान श्रीराम की उपस्थिति देखकर आपने युद्ध विराम कर दिया!" — तब भगवान शिव बोले — "हे राजन, आप राम, हनुमान और मेरे अंदर देखकर बताएं, यहाँ राम कहाँ हैं? हनुमान कहाँ हैं?" राजा शिवमणि ने भक्ति भाव से देखा तो उन्हें राम और हनुमान — दोनों में शिव का ही स्वरूप दिखाई दिया। अर्थात भगवान शिव सर्वव्यापक हैं। ऐसा ही एक प्रश्न और आता है — जब अहिरावण राम और लक्ष्मण जी को पाताल लोक ले गया, तो हनुमान जी ने जाना कि अहिरावण की मृत्यु बिना भगवान शिव की पंचतत्व पूजा के संभव नहीं। वे चिंतित हुए कि शिवलिंग कहाँ से लाऊँ? समय बहुत कम था, अहिरावण किसी भी क्षण आ सकता था। हनुमानजी की दुविधा :- हनुमान जी ने विचार किया — “भगवान शिव तो सृष्ट...